रांची / धनबाद : झारखंड के धनबाद में यातायात पुलिस की वाहन जांच के दौरान एक महिला के घायल होने के बाद विवाद खड़ा हो गया. घटना बैंक मोड़ थाना क्षेत्र के जेपी चौक की है, जहां गुरुवार को ट्रैफिक पुलिस वाहनों की जांच कर रही थी. इसी दौरान झरिया से अपनी मां के साथ बाइक पर आ रहे एक युवक को रोकने की कोशिश की गई. बाइक अनियंत्रित होकर गिर गई और पीछे बैठी महिला सड़क पर गिरकर घायल हो गईं. स्थानीय रिपोर्ट के मुताबिक, महिला के घुटने में गंभीर चोट आई है और उन्हें इलाज के लिए नर्सिंग होम में भर्ती कराया गया.

महिला के घायल होने के बाद बढ़ा विवाद
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, ट्रैफिक पुलिस ने बिना हेलमेट बाइक चलाने के आरोप में युवक को रोकने की कोशिश की थी. इसी दौरान बाइक गिर गई और महिला सड़क पर जा गिरीं. घटना के बाद मौके पर मौजूद लोगों में नाराजगी फैल गई. महिला को घायल देखकर उनके बेटे का गुस्सा भी बढ़ गया. आरोप है कि उसने मौके पर मौजूद ट्रैफिक जवान वकील प्रसाद गोराईं के साथ हाथापाई की. बीच-बचाव करने पहुंचे दूसरे जवान चंदन कुमार चौधरी के साथ भी कथित तौर पर बदसलूकी की गई. हालांकि, पुलिस की ओर से महिला को जानबूझकर धक्का देने या गिराने के आरोप को निराधार बताया गया है.
सवाल सिर्फ पुलिस की गलती का नहीं है
इस घटना ने सड़क पर वाहन जांच के दौरान पुलिस के व्यवहार और नागरिकों के संयम, दोनों को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं. अगर जांच के दौरान पुलिसकर्मी की कार्रवाई से किसी नागरिक को चोट पहुंचती है, तो उसकी शिकायत करने और जांच की मांग करने का अधिकार नागरिक के पास है. लेकिन किसी पुलिसकर्मी के साथ मारपीट या सरकारी काम में बाधा डालना भी कानून के दायरे में गंभीर विषय है.यानी सवाल दो तरफ हैं. क्या वाहन जांच के दौरान पुलिस को अधिक संवेदनशील और सुरक्षित तरीके से वाहन रोकना चाहिए था? और क्या किसी कथित गलत कार्रवाई के जवाब में नागरिक को कानून अपने हाथ में लेने का अधिकार मिल जाता है? दोनों सवालों का जवाब कानून और संवैधानिक व्यवस्था के भीतर ही तलाशना होगा.
हेलमेट जरूरी है, लेकिन जांच का तरीका भी सवालों से परे नहीं
सड़क सुरक्षा के लिहाज से हेलमेट पहनना बेहद जरूरी है. धनबाद में पुलिस और प्रशासन की ओर से भी लगातार हेलमेट और यातायात नियमों के पालन को लेकर जागरूकता अभियान चलाए जाते रहे हैं. लेकिन यातायात नियमों का पालन कराने की जिम्मेदारी निभाते समय पुलिस की कार्रवाई भी सुरक्षित और निर्धारित प्रक्रिया के अनुरूप होनी चाहिए. किसी वाहन को रोकते समय यदि अचानक की गई कार्रवाई से दुर्घटना होती है, तो उसकी निष्पक्ष जांच जरूरी है. वहीं, दुर्घटना या पुलिस की कार्रवाई से नाराज होकर पुलिसकर्मियों के साथ हिंसा करना भी स्वीकार्य नहीं हो सकता.
पुलिस और जनता-दोनों की जिम्मेदारी
धनबाद की यह घटना एक बड़े सवाल की ओर इशारा करती है. पुलिस कानून लागू करने वाली संस्था है, इसलिए उससे अधिक संवेदनशीलता और जवाबदेही की अपेक्षा की जाती है. लेकिन नागरिकों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे किसी विवाद की स्थिति में हिंसा का रास्ता न अपनाएं. अगर पुलिस की कार्रवाई गलत है, तो उसके खिलाफ शिकायत, जांच और कानूनी कार्रवाई का रास्ता मौजूद है. इसी तरह अगर किसी नागरिक ने ड्यूटी पर तैनात पुलिसकर्मी के साथ मारपीट की है, तो उसकी भी कानूनी जांच होनी चाहिए.
लोकतंत्र में न तो पुलिस कानून से ऊपर है और न ही कोई नागरिक कानून अपने हाथ में ले सकता है. इस घटना की निष्पक्ष जांच से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि जेपी चौक पर वास्तव में क्या हुआ था और महिला के घायल होने के लिए जिम्मेदारी किसकी थी. तब तक आरोपों को तथ्य मानने के बजाय जांच के निष्कर्ष का इंतजार करना ही उचित होगा. कानून व्यवस्था तभी मजबूत होगी, जब पुलिस संवेदनशीलता के साथ कानून लागू करे और जनता अपने अधिकारों के साथ अपने दायित्वों को भी समझे.
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