RANCHI : झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में सुरक्षा बलों के अभियानों के साथ-साथ आत्मसमर्पण और पुनर्वास नीति को भी सरकार की रणनीति का अहम हिस्सा माना जाता है. सरकार का दावा रहा है कि हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले नक्सलियों को सम्मान के साथ नई जिंदगी शुरू करने का अवसर दिया जाएगा और पुनर्वास के तहत उन्हें जरूरी सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी. लेकिन इसी दावे के बीच झारखंड से सामने आई तस्वीर कई गंभीर सवाल खड़े करती है. नक्सली संगठन छोड़कर सामान्य जीवन में लौट चुके कई लोगों के सामने आज भी पहचान से जुड़े जरूरी दस्तावेजों का संकट बना हुआ है. कुछ लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है, तो किसी के पास पैन कार्ड या अन्य पहचान पत्र नहीं हैं. कई मामलों में बैंक खाता और पासबुक तक उपलब्ध नहीं है.ऐसे में राज्य में चल रही SIR यानी मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया ने इन लोगों की परेशानी और बढ़ा दी है.
हथियार छोड़े, लेकिन कागजों की लड़ाई जारी
नक्सलवाद छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों के लिए चुनौती केवल पहचान पत्रों तक सीमित नहीं है. पुनर्वास से जुड़ी कई सुविधाएं भी अभी तक पूरी तरह नहीं मिल पाने की बात सामने आई है. जमीन, आवास, कौशल प्रशिक्षण, बच्चों की शिक्षा और इलाज जैसी जरूरतें भी कई मामलों में लंबित बताई जा रही हैं. सरकार पर भरोसा करके जंगल और संगठन छोड़ने वाले इन लोगों के सामने अगर समय पर पहचान, रोजगार और पुनर्वास की सुविधाएं नहीं पहुंचती हैं, तो उनमें निराशा बढ़ने का खतरा रहता है. यही स्थिति आत्मसमर्पण नीति की प्रभावशीलता पर भी सवाल खड़े करती है.आखिर जिस नीति के जरिए सरकार नक्सलियों को हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में आने के लिए प्रेरित करती है, उसकी असली सफलता इस बात से तय होगी कि हथियार डालने के बाद उनकी जिंदगी कितनी सुरक्षित और सम्मानजनक बन पाती है.
2021 से जुलाई 2026 तक 167 नक्सलियों ने किया आत्मसमर्पण
झारखंड पुलिस के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2021 से जुलाई 2026 तक राज्य में कुल 167 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया है. आंकड़ों के मुताबिक:
- 2021 में 20 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया.
- 2022 में 14 नक्सलियों ने हथियार छोड़े.
- 2023 में 26 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया.
- 2024 में 24 नक्सलियों ने संगठन छोड़ा.
- 2025 में 38 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया.
- जुलाई 2026 तक 45 नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं.
इन सभी ने संगठन और हिंसा का रास्ता छोड़कर सामान्य जीवन में लौटने का फैसला किया.
देशभर में हजारों नक्सलियों ने छोड़ा हिंसा का रास्ता
अगर देशभर की बात करें तो केंद्र सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024 से मार्च 2026 के बीच 3,927 नक्सलियों ने आत्मसमर्पण किया. वहीं, अकेले वर्ष 2025 में 2,337 नक्सलियों ने हथियार डाले. केंद्र सरकार नक्सलवाद के खिलाफ अपनी रणनीति में आत्मसमर्पण और पुनर्वास को महत्वपूर्ण हिस्सा मानती है. इसका उद्देश्य हथियार छोड़ने वाले लोगों को आर्थिक सहायता, कौशल प्रशिक्षण और रोजगार के जरिए समाज की मुख्यधारा में वापस लाना है.
हजारीबाग ओपन जेल में 86 आत्मसमर्पित नक्सली
हजारीबाग ओपन जेल में इस समय 86 आत्मसमर्पित नक्सली रह रहे हैं. यहां से सामने आई जानकारी में पुनर्वास व्यवस्था से जुड़ी कई समस्याएं सामने आई हैं. बताया गया है कि कुछ लोगों के पास आधार कार्ड नहीं है. कई लोगों के पास पैन कार्ड और पहचान से जुड़े दूसरे दस्तावेज भी नहीं हैं. कुछ के पास बैंक पासबुक तक नहीं है. आधार कार्ड नहीं होने के कारण बैंक खाता खुलवाने में भी परेशानी की बात सामने आई है. इसके अलावा जमीन, आवास, कौशल प्रशिक्षण, बच्चों की पढ़ाई और इलाज जैसी सुविधाओं से जुड़े मामले भी कई स्तरों पर लंबित बताए जा रहे हैं. यानी बंदूक छोड़ने के बाद इन लोगों के सामने अब एक अलग तरह की लड़ाई है. यह लड़ाई जंगल और सुरक्षा बलों से नहीं, बल्कि दस्तावेजों और सरकारी दफ्तरों की प्रक्रिया से जुड़ी है.
SIR के बीच पहचान का संकट और गंभीर
झारखंड में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR की प्रक्रिया के दौरान पहचान से जुड़े दस्तावेजों का महत्व और बढ़ गया है. जिन लोगों के पास नागरिक पहचान से जुड़े जरूरी कागजात नहीं हैं, उनके लिए मतदाता सूची की प्रक्रिया में शामिल होना मुश्किल हो सकता है. हालांकि, पूर्व में नक्सली रहा होना किसी व्यक्ति को मतदाता बनने से अयोग्य नहीं बनाता. अगर कोई व्यक्ति भारत का नागरिक है और मतदाता बनने के लिए निर्धारित कानूनी पात्रता पूरी करता है, तो वह मतदाता सूची में नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर सकता है. ऐसे लोग अपने परिवार के माध्यम से भी आवेदन कर सकते हैं और कुछ स्थानों पर ऐसा किए जाने की जानकारी सामने आई है.
सरकार पर भरोसा करके हथियार छोड़ा, अब कागजों के लिए भटक रहे
हजारीबाग ओपन जेल में रह रहे एक वरिष्ठ आत्मसमर्पित नक्सली ने नाम सार्वजनिक नहीं करने की शर्त पर अपनी परेशानी साझा की. उन्होंने कहा कि सरकार पर भरोसा करके उन्होंने हथियार डाले, संगठन छोड़ा और जंगल की जिंदगी से बाहर निकलने का फैसला किया. लेकिन सामान्य जीवन शुरू करने के लिए जिन बुनियादी दस्तावेजों की जरूरत होती है, वही आज भी कई लोगों के पास नहीं हैं. उनके मुताबिक, कई आत्मसमर्पित नक्सलियों के पास आधार कार्ड, पैन कार्ड, पहचान पत्र और बैंक पासबुक तक नहीं है. ऐसे में सामान्य जिंदगी शुरू करना मुश्किल हो जाता है. उन्होंने कहा कि वे अब दोबारा पुराने रास्ते पर नहीं लौटना चाहते, लेकिन सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि जिसने बंदूक छोड़ दी है, उसे समाज में सम्मान के साथ जीने के लिए पहचान और जरूरी सुविधाएं मिलें.
स्पेशल ब्रांच ने मांगी पुनर्वास की रिपोर्ट
मामला सामने आने के बाद झारखंड पुलिस की स्पेशल ब्रांच मुख्यालय ने हजारीबाग जेल अधीक्षक को पत्र लिखा है. पत्र के जरिए आत्मसमर्पित नक्सलियों को दी जा रही पुनर्वास सुविधाओं और लंबित मामलों की जानकारी मांगी गई है. साथ ही आत्मसमर्पित नक्सलियों के आधार कार्ड, पैन कार्ड और बैंक खाते समेत जरूरी दस्तावेज तैयार कराने की दिशा में कार्रवाई करने को कहा गया है. स्पेशल ब्रांच की इस पहल से संकेत मिलता है कि आत्मसमर्पित नक्सलियों के पुनर्वास से जुड़ी समस्याओं को अब सरकारी स्तर पर भी गंभीरता से देखा जा रहा है. अब यह पता लगाना जरूरी है कि किस आत्मसमर्पित नक्सली को कौन-कौन सी सुविधा मिली है, किसका मामला लंबित है और आखिर किन वजहों से वर्षों बाद भी कुछ लोग बुनियादी दस्तावेजों से वंचित हैं.
आत्मसमर्पण नीति में आर्थिक सहायता और रोजगार का प्रावधान
केंद्र सरकार की नीति के तहत आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों को आर्थिक सहायता, मासिक वजीफा और कौशल प्रशिक्षण जैसी सुविधाएं देने का प्रावधान है. मौजूदा केंद्रीय नीति के अनुसार, वरिष्ठ कैडर के लिए 5 लाख रुपये और अन्य कैडर के लिए 2.5 लाख रुपये तक की सहायता का प्रावधान है. इसके अलावा आत्मसमर्पण करने वालों को 36 महीने तक 10 हजार रुपये मासिक वजीफा देने की व्यवस्था है. हथियार और गोला-बारूद जमा करने पर अतिरिक्त सहायता का भी प्रावधान है.झारखंड में भी आत्मसमर्पण नीति के तहत आर्थिक सहायता, हथियारों के बदले मुआवजा, कौशल प्रशिक्षण, जमीन और पुनर्वास से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध कराने की व्यवस्था है. हालांकि, हजारीबाग ओपन जेल से सामने आई स्थिति यह संकेत देती है कि नीति में किए गए प्रावधान और उनके जमीनी क्रियान्वयन के बीच अभी भी अंतर है.
आत्मसमर्पित नक्सलियों की जिंदगी ही सरकार के दावे की असली परीक्षा
नक्सलवाद के खिलाफ लड़ाई में जंगलों में सुरक्षा अभियान चलाना जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही जरूरी उन लोगों को समाज में टिकाए रखना भी है, जो हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने का फैसला करते हैं.सरकार आज भी सक्रिय नक्सलियों से हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौटने की अपील करती है. ऐसे में पहले से आत्मसमर्पण कर चुके लोगों की जिंदगी इस अपील की सबसे बड़ी मिसाल बन सकती है. अगर हथियार छोड़ने वाले व्यक्ति को पहचान, सम्मान, रोजगार और सुरक्षित भविष्य मिलता है, तो जंगल में सक्रिय दूसरे लोगों के बीच भी सरकार पर भरोसा बढ़ सकता है. लेकिन अगर आत्मसमर्पण के वर्षों बाद भी कोई व्यक्ति आधार कार्ड, पैन कार्ड, बैंक खाता, जमीन, आवास और बच्चों की शिक्षा जैसी बुनियादी जरूरतों के लिए परेशान है, तो यह पुनर्वास नीति के जमीनी क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
झारखंड में अब सिर्फ 18 इनामी नक्सली
इस बीच झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ चलाए जा रहे अभियान का असर भी दिखाई दे रहा है. झारखंड पुलिस की ओर से उपलब्ध जानकारी के अनुसार, राज्य में सक्रिय या वांछित इनामी नक्सलियों की संख्या अब घटकर 18 रह गई है. इन नक्सलियों पर उनकी संगठनात्मक भूमिका और नक्सली गतिविधियों के आधार पर सरकार की ओर से इनाम घोषित किया गया है. सूची में अलग-अलग नक्सली संगठनों से जुड़े कई महत्वपूर्ण कमांडर शामिल हैं. इनमें CPI (Maoist), TPC, JJMP और PLFI जैसे संगठन शामिल हैं. वांछित नक्सलियों की सूची में सबसे ज्यादा नाम CPI (Maoist) से जुड़े लोगों के हैं. ऐसे में झारखंड में नक्सलवाद के खिलाफ अभियान के साथ अब सरकार के सामने दूसरी बड़ी चुनौती यह है कि जो लोग हथियार छोड़कर मुख्यधारा में लौट चुके हैं, उन्हें वास्तव में ऐसी जिंदगी मिले, जिससे दूसरे सक्रिय नक्सलियों को भी हिंसा छोड़ने और सरकार पर भरोसा करने का ठोस कारण मिले.
