RANCHI : आप एक महिला हैं. आधी रात है. आप अपने घर में सो रही हैं. घर में कोई पुरुष सदस्य नहीं है. अचानक कोई आदमी आपके कमरे में घुस आता है… आपके कपड़े उठाता है, आपको पकड़ता है. आपके साथ अश्लील हरकत करता है… तो आप एक महिला होने के नाते उस रात आखिर किस बात का इंतजार करेंगी? इस बात का कि अपराधी ने अपराध की अगली स्टेज पूरी की या नहीं?
करीब 26 साल पुराने एक मामले में झारखंड हाई कोर्ट का फैसला आया है और इस फैसले ने एक बेहद गंभीर सवाल फिर सामने ला दिया है. महिला की सुरक्षा और कानून की कसौटी के बीच आखिर वह रेखा कहां है, जहां एक महिला का डर ‘अपराध’ माना जाएगा और कहां से वह सिर्फ ‘अश्लील हरकत’ बनकर रह जाएगा? मामला है 27 दिसंबर 1999 की देर रात का. पूर्वी सिंहभूम जिले के एक गांव में एक महिला अपने घर में सो रही थी. घर में कोई पुरुष सदस्य मौजूद नहीं था. रात का सन्नाटा था और आरोप के मुताबिक, इसी दौरान आरोपी दरवाजा खोलकर घर के अंदर पहुंच गया. महिला के कमरे में दाखिल हुआ. उसके साथ आपत्तिजनक व्यवहार किया. उसके कपड़े उठाए और उसके साथ छेड़छाड़ की. यानी एक महिला के लिए वह रात सिर्फ रात नहीं थी.
वह डर था, असुरक्षा थी और अपने ही घर में सुरक्षित न होने का एहसास था.
निचली अदालत ने इस मामले में आरोपी को IPC की धारा 376/511 के तहत चार साल की सश्रम कारावास की सजा सुनाई थी. लेकिन करीब 26 साल बाद हाई कोर्ट ने इस निष्कर्ष में बदलाव किया. जस्टिस प्रदीप कुमार श्रीवास्तव की अदालत ने कहा कि केवल रात में घर में घुसना, महिला के कपड़े उठाना और उसे पकड़ लेना अपने आप में रेप के प्रयास का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है.
रेप के प्रयास के लिए ऐसा विशिष्ट और स्पष्ट प्रत्यक्ष कृत्य होना चाहिए, जिससे यह साबित हो कि आरोपी ने रेप करने की दिशा में कदम उठाया था.
महिला की दहलीज, कानून की कसौटी
एक महिला के लिए अपराध शायद उस वक्त शुरू हो जाता है, जब कोई उसकी मर्जी के खिलाफ उसके घर में घुसता है. लेकिन कानून यह पूछ सकता है कि अपराधी आखिर कितनी दूर तक पहुंचा था? कोर्ट ने हालांकि आरोपी के आचरण को अश्लील हमला माना और कहा कि इससे महिला की लज्जा भंग होने की आशंका थी. इसलिए मामला IPC की धारा 354 के तहत माना गया. यानी… दरवाजा तोड़कर या खोलकर रात में किसी महिला के कमरे में घुसना गलत है… उसके कपड़े उठाना गलत है… उसे पकड़ना गलत है… उसकी गरिमा पर हमला करना गलत है… लेकिन रेप के प्रयास की कानूनी कसौटी उससे एक कदम आगे की स्पष्ट मंशा और प्रत्यक्ष कृत्य तलाशती है.
और शायद यहीं पर एक महिला होने के नाते के मन में सवाल पैदा होता है…जब कोई मेरी इजाजत के बिना मेरे घर और मेरी देह की सीमा तक पहुंच गया, तब मुझे खुद को कितना सुरक्षित समझना चाहिए था?
26 साल बाद भी उस रात का सवाल बाकी
यह सवाल अदालत के फैसले पर सवाल उठाने के लिए नहीं है. यह सवाल उस सामाजिक सोच पर है, जहां महिलाओं को आज भी यह समझाना पड़ता है कि उनके साथ क्या हुआ? कहां हुआ? कितना हुआ? और अपराधी ने आखिर क्या करने की कोशिश की थी? क्योंकि महिला के लिए डर का कोई IPC, CRPC, BNSS सेक्शन नहीं होता. उसके लिए आधी रात को घर में किसी का घुसना ही काफी हो सकता है उसकी पूरी जिंदगी का भरोसा हिला देने के लिए.
26 साल बाद अदालत ने कानून की कसौटी पर अपराध की प्रकृति तय कर दी. लेकिन उस महिला से कोई यह पूछे कि 27 दिसंबर 1999 की वह रात उसके लिए कितनी लंबी थी? यही इस फैसले की सबसे संवेदनशील परत है. कानून सबूत मांगता है. अदालत प्रत्यक्ष कृत्य देखती है. और न्याय व्यवस्था को ऐसा करना भी पड़ता है. लेकिन समाज को यह भी समझना होगा कि महिला की सहमति कोई दरवाजा नहीं है जिसे अपराधी रात के अंधेरे में खोलकर अंदर चला जाए. और किसी महिला की गरिमा पर हमला तभी गंभीर नहीं हो जाता, जब अपराधी अपनी कोशिश को अंतिम अंजाम तक पहुंचा दे. क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं कि अपराधी ने क्या किया?
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सवाल यह भी है कि एक महिला को अपने ही घर में डरने की नौबत क्यों आई? यह फैसला कानून की एक बारीक सीमा जरूर बताता है. लेकिन समाज के लिए संदेश बिल्कुल साफ है – महिला की सुरक्षा अपराध की आखिरी सीमा पर नहीं, पहली गलत हरकत पर शुरू होनी चाहिए.
