RANCHI : झारखंड मुक्ति मोर्चा (JMM) की राजनीति में कई चेहरे सामने आते हैं, लेकिन कुछ चेहरे ऐसे होते हैं जो मंच के आगे से ज्यादा मंच के पीछे पूरी पटकथा तय करते हैं. इन्हीं में से एक बड़ा नाम रहा है गिरिडीह के विधायक सुदिव्य कुमार, जिन्हें राजनीतिक गलियारों में प्यार और सम्मान से ‘सोनू दा’ कहा जाता है. हेमंत सोरेन के पूरे राजनीतिक सफर और सरकार के कार्यकाल में सुदिव्य कुमार सोनू की छवि हमेशा मुख्यमंत्री के सबसे विश्वस्त रणनीतिकार और उनके ‘दाहिने हाथ’ के रूप में उभरी. झारखंड की राजनीति को करीब से देखने वाले विश्लेषक उन्हें सिर्फ एक विधायक नहीं, बल्कि संकटमोचक और जेएमएम के थिंक-टैंक का अहम हिस्सा मानते हैं.
संकट के दौर में सबसे मजबूत ढाल
जब-जब झारखंड में राजनीतिक अस्थिरता का दौर आया चाहे वो ईडी की कार्रवाई के दौरान विधायकों को एकजुट रखने की रणनीति हो या सरकार गठन के समय सहयोगियों को साधने की बात सुदिव्य कुमार सोनू हर मोर्चे पर आगे रहे. रांची से लेकर दिल्ली तक, बातचीत की मेज पर वे हमेशा सोरेन परिवार के सबसे भरोसेमंद प्रतिनिधि के रूप में नजर आए.
रणनीतिक पकड़ और संगठन कौशल
सुदिव्य कुमार सिर्फ बयानबाजी तक सीमित रहने वाले नेता नहीं रहे हैं. चुनावी समीकरणों की समझ, बूथ स्तर का प्रबंधन और गठबंधन दलों (कांग्रेस, राजद, वामदल) के साथ तालमेल बिठाने में उनकी कुशलता बेजोड़ मानी जाती रही है. हेमंत सोरेन जब भी किसी बड़े नीतिगत फैसले या चुनावी रणनीति पर मंथन करते, सोनू दा का सुझाव बेहद मायने रखता था.
विवादों से दूर, काम पर फोकस
एक दौर ऐसा था जब कई बड़े नेता गुटबाजी या बयानबाजी के चलते चर्चा में रहते थे, वहीं सुदिव्य कुमार सोनू ने खुद को मीडिया की बेवजह चकाचौंध से दूर रखा. उनका पूरा ध्यान पार्टी संगठन को मजबूत करने और मुख्यमंत्री के निर्देशों को जमीन पर उतारने पर रहता था. यह शांत स्वभाव और बिना शर्त निष्ठा ही उन्हें हेमंत सोरेन के कोर ग्रुप में सबसे ऊपर ले गई.
गांडेय उपचुनाव और राजनीतिक समीकरण
सुदिव्य कुमार के प्रभाव का सबसे बड़ा प्रमाण तब दिखा जब गांडेय विधानसभा सीट पर कल्पना सोरेन के चुनावी आगाज की जमीन तैयार की गई. गिरिडीह जिले की राजनीति पर उनकी मजबूत पकड़ का नतीजा था कि उन्होंने पूरे इलाके में सांगठनिक ढांचे को एकजुट रखा और उस पूरे राजनीतिक ट्रांजिशन को बेहद सहज बना दिया. झारखंड की सियासत में चेहरे बदलते रहते हैं, लेकिन पर्दे के पीछे रहकर ताकत देने वाले रणनीतिकार हमेशा इतिहास का हिस्सा बनते हैं. सुदिव्य कुमार सोनू ने अपनी राजनीतिक सूझबूझ, अटूट वफादारी और रणनीतिक समझ से खुद को साबित किया कि क्यों उन्हें हेमंत सोरेन का ‘दाहिना हाथ’ कहा जाना महज एक उपमा नहीं, बल्कि एक सियासी हकीकत थी.
