RANCHI : राजधानी के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आदिवासी एकता महाजुटान महारैली का आयोजन किया जा रहा है. रैली की शुरुआत सुबह 11 बजे से होगी. प्रस्तावित परिसीमन में आदिवासी आरक्षित सीटों की संख्या कम होने की आशंका और आदिवासी अधिकारों की रक्षा इस आयोजन के प्रमुख मुद्दे हैं. सुबह से ही राज्य के अलग-अलग हिस्सों से लोगों के मोरहाबादी मैदान पहुंचने का सिलसिला शुरू हो गया है.
तैयारियों का लिया जायजा
महाजुटान की तैयारियों और आयोजन स्थल पर की गई व्यवस्थाओं का निरीक्षण करने के लिए पूर्व विधायक बंधु तिर्की और केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष अजय तिर्की रविवार को मोरहाबादी मैदान पहुंचे. दोनों नेताओं ने कार्यक्रम स्थल का जायजा लिया. निरीक्षण के दौरान जहां भी व्यवस्था में कमी दिखाई दी, उसे तत्काल दूर करने का निर्देश संबंधित लोगों को दिया गया.
आयोजकों का दावा है कि महाजुटान में झारखंड के विभिन्न जिलों से बड़ी संख्या में आदिवासी समाज के लोग शामिल होंगे. कार्यक्रम में कांग्रेस नेता बंधु तिर्की, सामाजिक कार्यकर्ता दयामनी बरला, रमा खलखो, आदिवासी नेता लक्ष्मी नारायण मुंडा, अजय तिर्की और शिवा कच्छप समेत कई प्रमुख चेहरे मौजूद रहेंगे. मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के साथ ही पक्ष और विपक्ष के आदिवासी विधायकों तथा सांसदों को भी कार्यक्रम के लिए आमंत्रित किया गया है. मध्य प्रदेश सहित दूसरे राज्यों से भी आदिवासी नेताओं के पहुंचने की संभावना है.
परिसीमन को लेकर क्यों है विरोध?
महाजुटान के आयोजकों का कहना है कि आगामी परिसीमन में यदि सीटों का निर्धारण मुख्य रूप से जनसंख्या के आधार पर किया गया, तो झारखंड में आदिवासी आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या प्रभावित हो सकती है. इसी आशंका को लेकर आदिवासी संगठनों में चिंता है. पूर्व विधायक बंधु तिर्की का कहना है कि वर्ष 2006-07 के दौरान भी झारखंड में परिसीमन को लेकर प्रस्ताव सामने आया था. उस समय आदिवासी आरक्षित सीटों की संख्या घटने की आशंका जताई गई थी. व्यापक विरोध के बाद राज्य में परिसीमन की प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकी थी. उनका कहना है कि मौजूदा परिस्थितियों में एक बार फिर इसी तरह की चिंता सामने आ रही है.
पांचवीं अनुसूची और पेसा कानून भी मुद्दे में
आयोजकों के मुताबिक झारखंड पांचवीं अनुसूची के अंतर्गत आने वाला राज्य है. इसलिए आदिवासी बहुल क्षेत्रों के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों को ध्यान में रखते हुए परिसीमन की प्रक्रिया पर विचार किया जाना चाहिए. महाजुटान में आदिवासी आरक्षित सीटों में संभावित कमी के विरोध में प्रस्ताव पारित किए जाने की तैयारी है. इसके अलावा पांचवीं अनुसूची, पेसा कानून, केंद्र सरकार के हालिया खनन कानून, विस्थापन और पलायन जैसे मुद्दों पर भी चर्चा होगी. आयोजकों ने कहा कि यह महाजुटान केवल परिसीमन के विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि आदिवासी समाज के संवैधानिक अधिकारों, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जल-जंगल-जमीन से जुड़े सवालों को मजबूती से उठाने का मंच भी है.
