रांची /नई दिल्ली : देश की सर्वोच्च अदालत को केवल न्याय देने वाली संस्था नहीं, बल्कि संविधान और लोकतांत्रिक व्यवस्था की अंतिम संरक्षक के रूप में देखा जाता है. अदालत की कार्यवाही में अनुशासन, संयम और गरिमा को सर्वोच्च महत्व दिया जाता है. ऐसे में जब न्यायालय के भीतर ही मर्यादा भंग होने की घटनाएं सामने आती हैं, तो वे केवल एक व्यक्ति के आचरण तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि न्यायपालिका की गरिमा और न्यायिक व्यवस्था की सुरक्षा पर भी सवाल खड़े करती हैं.

शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट में हुई एक ऐसी ही घटना ने अदालत की कार्यवाही के दौरान शिष्टाचार और अनुशासन को लेकर नई चर्चा छेड़ दी. सुनवाई के बीच एक याचिकाकर्ता ने अदालत के भीतर कागज फेंके, न्यायाधीशों के प्रति अभद्र भाषा का इस्तेमाल किया और उन्हें निर्देश देने का प्रयास किया. इसके बाद सुरक्षा कर्मियों को हस्तक्षेप कर उसे अदालत कक्ष से बाहर ले जाना पड़ा. यह घटना सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में उन चुनिंदा मामलों में शामिल हो गई है, जब अदालत की गरिमा को खुले तौर पर चुनौती दी गई.
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सुनवाई के दौरान बिगड़ा माहौल
यह मामला न्यायमूर्ति के. वी. विश्वनाथन और न्यायमूर्ति आलोक अराधे की पीठ के समक्ष सुनवाई के लिए सूचीबद्ध था. प्रबल प्रताप नामक याचिकाकर्ता अपनी अपील पर बहस के दौरान अचानक उत्तेजित हो गया.
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, उसने अदालत के भीतर कागज फेंकने शुरू कर दिए और न्यायाधीशों के प्रति आपत्तिजनक भाषा का प्रयोग किया. इतना ही नहीं, वह अदालत की कार्यवाही के बीच न्यायाधीशों को निर्देश देने लगा. स्थिति असामान्य होते देख सुप्रीम कोर्ट की सुरक्षा टीम ने तुरंत हस्तक्षेप किया और उसे अदालत कक्ष से बाहर ले गई. इसके बाद न्यायालय की कार्यवाही सामान्य रूप से आगे बढ़ाई गई.
2025 में मुख्य न्यायाधीश की अदालत में भी हुई थी अभूतपूर्व घटना
यह पहली बार नहीं है जब सुप्रीम कोर्ट के भीतर इस तरह की घटना सामने आई हो. 6 अक्टूबर 2025 को तत्कालीन भारत के मुख्य न्यायाधीश बी. आर. गवई की अदालत में सुनवाई के दौरान एक वकील ने अचानक नारेबाजी शुरू कर दी थी. वकील राकेश किशोर ने कथित तौर पर “सनातन का अपमान नहीं सहेंगे” के नारे लगाए और मुख्य न्यायाधीश की ओर जूता उछालने का प्रयास किया.
हालांकि सुरक्षा व्यवस्था के कारण कोई अप्रिय स्थिति नहीं बनी. बाद में न्यायमूर्ति गवई ने इस घटना को अधिक महत्व नहीं देते हुए इसे “भूली-बिसरी बात” बताया था. इसके बावजूद इस घटना ने अदालतों की सुरक्षा और न्यायिक संस्थानों की गरिमा को लेकर व्यापक बहस को जन्म दिया.
1999 की घटना ने पूरे न्यायिक तंत्र को झकझोर दिया था
सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में अदालत की मर्यादा भंग होने की सबसे चर्चित घटनाओं में 26 फरवरी 1999 का मामला भी शामिल है. उस दिन अधिवक्ता नंद लाल बलवानी बिना किसी सूचीबद्ध मामले के कोर्ट नंबर-1 में पहुंचे, जहां तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश ए. एस. आनंद की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ सुनवाई कर रही थी.
कार्यवाही के दौरान उन्होंने पुलिस एजेंसियों पर कथित उत्पीड़न का आरोप लगाते हुए नारेबाजी शुरू कर दी और मुख्य न्यायाधीश की ओर जूता फेंक दिया. इस घटना ने पूरे न्यायिक तंत्र को झकझोर दिया और देशभर में इसकी व्यापक चर्चा हुई.
अदालत ने दिखाई सख्ती
1999 की घटना के बाद सुप्रीम कोर्ट ने तत्काल कड़ा रुख अपनाया. अदालत ने नंद लाल बलवानी को न्यायालय की घोर आपराधिक अवमानना का दोषी ठहराया और उन्हें चार महीने के साधारण कारावास तथा दो हजार रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई. इसके बाद बार काउंसिल ने भी अनुशासनात्मक कार्रवाई करते हुए उनका नाम अपने अभिलेखों से हटाने और भविष्य में वकालत करने पर प्रतिबंध लगाने का निर्णय लिया.
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया था कि किसी न्यायिक निर्णय से असहमति व्यक्त करना प्रत्येक नागरिक का अधिकार हो सकता है, लेकिन यह अधिकार किसी भी स्थिति में अदालत की गरिमा का अपमान करने की अनुमति नहीं देता.
अदालत की गरिमा क्यों है महत्वपूर्ण?
भारतीय न्यायपालिका संविधान के तीन प्रमुख स्तंभों में से एक है. नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा, सरकार के निर्णयों की न्यायिक समीक्षा और कानून के शासन को बनाए रखने की जिम्मेदारी न्यायपालिका पर ही है.
इसी कारण अदालत की कार्यवाही के दौरान अनुशासन, शालीनता और सम्मान को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि न्यायिक प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा माना जाता है. यदि अदालत के भीतर अव्यवस्था या अभद्र व्यवहार को सामान्य माना जाने लगे, तो इससे न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता और निष्पक्षता दोनों प्रभावित हो सकती हैं.
तीन घटनाएं, एक स्पष्ट संदेश
शुक्रवार को याचिकाकर्ता द्वारा अदालत में कागज फेंकने की घटना, वर्ष 2025 में मुख्य न्यायाधीश की अदालत में जूता उछालने का प्रयास और 1999 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश पर जूता फेंकने की घटना—इन तीनों मामलों की परिस्थितियां अलग-अलग थीं, लेकिन इनसे निकलने वाला संदेश एक ही है.
लोकतंत्र में न्यायपालिका का सम्मान संविधान की मूल भावना से जुड़ा हुआ है. अदालत के किसी निर्णय से असहमति व्यक्त करने के लिए कानून में अनेक वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं, लेकिन अदालत की गरिमा को ठेस पहुंचाना या न्यायिक प्रक्रिया में व्यवधान उत्पन्न करना न तो स्वीकार्य है और न ही कानून इसकी अनुमति देता है.
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