करीब 25 साल पहले झारखंड एक सपना था. आज वह एक राज्य है. लेकिन सवाल यह है कि क्या उस सपने का सबसे बड़ा हकदार आज भी अपने अधिकार के लिए संघर्ष नहीं कर रहा? देखिए यह विशेष रिपोर्ट. 15 नवंबर 2000. भारत के राजनीतिक इतिहास का वह दिन जब लंबे आंदोलन और वर्षों के संघर्ष के बाद झारखंड देश का 28वां राज्य बना. इस आंदोलन में हजारों लोगों ने अपनी भागीदारी दी. आंदोलन को जन-जन तक पहुंचाने में कई नेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही. झारखंड आंदोलन के प्रमुख चेहरों में रहे दिशोम गुरु शिबू सोरेन और उससे भी पहले धरती आबा बिरसा मुंडा का नाम आज भी सम्मान के साथ लिया जाता है. बिरसा मुंडा ने अंग्रेजी शासन और शोषण के खिलाफ उलगुलान का बिगुल फूंका था. वहीं बाद के दशकों में अलग राज्य की मांग एक बड़े जनआंदोलन के रूप में उभरी. लेकिन अब सवाल उठता है. जिस झारखंड के लिए इतना बड़ा संघर्ष हुआ. क्या उस संघर्ष का लाभ सबसे पहले आदिवासी समाज तक पहुंचा?

जिन्होंने झारखंड बनाया,क्या वही आज सबसे ज्यादा उपेक्षित हैं?
झारखंड खनिज संपदा से समृद्ध है. यहां कोयला है. लोहा है. बॉक्साइट है. यूरेनियम है. घने जंगल हैं. ऊंचे पहाड़ हैं. खूबसूरत झरने हैं. पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं. देश की बड़ी औद्योगिक परियोजनाओं का आधार भी झारखंड ही रहा है. इसके बावजूद राज्य के अनेक आदिवासी बहुल गांव आज भी मूलभूत सुविधाओं से जूझ रहे हैं. कई इलाकों में आज भी पीने के पानी की समस्या बनी हुई है. सड़कें अधूरी हैं. स्वास्थ्य सेवाएं सीमित हैं. शिक्षा की गुणवत्ता चिंता का विषय है. रोजगार के अवसरों की कमी के कारण बड़ी संख्या में युवाओं का पलायन जारी है. झारखंड बनने के बाद राज्य ने कई मुख्यमंत्री देखे. इनमें अधिकांश मुख्यमंत्री आदिवासी समुदाय से रहे. हर सरकार ने आदिवासी विकास. जल. जंगल और जमीन की सुरक्षा. शिक्षा. स्वास्थ्य और रोजगार को अपनी प्राथमिकता बताया. सरकारी स्तर पर कई योजनाएं भी शुरू हुईं. लेकिन सवाल यह है कि क्या इन योजनाओं का लाभ हर उस गांव तक पहुंचा जहां से झारखंड आंदोलन की आवाज उठी थी? क्या आज भी आदिवासी परिवारों का जीवन उस स्तर तक पहुंच पाया है जिसकी उम्मीद राज्य गठन के समय की गई थी?
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जमीन का मुद्दा आज भी झारखंड की राजनीति और समाज का सबसे संवेदनशील विषय बना हुआ है. राज्य में विकास परियोजनाओं. उद्योगों और अन्य सार्वजनिक कार्यों के लिए समय-समय पर भूमि अधिग्रहण को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं. हाल के वर्षों में रिम्स-2 सहित कई परियोजनाओं को लेकर भी स्थानीय स्तर पर लोगों ने अपनी आशंकाएं और विरोध दर्ज कराया है. प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि विकास जरूरी है. लेकिन उनकी जमीन. आजीविका और सम्मान की रक्षा भी उतनी ही जरूरी है. यह रिपोर्ट विकास का विरोध नहीं करती. यह सिर्फ एक सवाल पूछती है. अगर झारखंड की पहचान उसकी आदिवासी संस्कृति है. अगर जंगल उसकी सांस हैं. अगर जमीन उसकी अस्मिता है. तो फिर सबसे ज्यादा संघर्ष करने वाला समाज आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए क्यों लड़ रहा है? अगर राज्य बनने के 25 साल बाद भी कोई गांव पानी के लिए तरसता है. अगर कोई मरीज सड़क नहीं होने के कारण अस्पताल तक नहीं पहुंच पाता. अगर कोई छात्र बिजली के बिना पढ़ाई करता है. तो फिर विकास के दावों की असली तस्वीर क्या है?
झारखंड बना. सरकारें बदलीं. योजनाएं बनीं. हजारों करोड़ रुपये खर्च हुए. लेकिन सवाल अब भी वहीं खड़ा है. क्या झारखंड आंदोलन का सपना पूरा हुआ? या फिर वह सपना आज भी जंगलों. पहाड़ों और गांवों में अपने जवाब का इंतजार कर रहा है? क्योंकि इतिहास सिर्फ राज्य बनने से नहीं लिखा जाता. इतिहास तब लिखा जाता है जब उस राज्य का सबसे अंतिम व्यक्ति भी सम्मान. अधिकार और विकास महसूस करे.
