रांची : झारखंड हाईकोर्ट ने एक वैवाहिक विवाद से जुड़े बहुचर्चित मामले में डीएनए टेस्ट कराने की मांग खारिज कर दी है. अदालत ने कहा कि जिस बच्चे के पितृत्व को लेकर विवाद शुरू हुआ था, वह अब वयस्क हो चुका है. ऐसे में उसकी मां उसकी ओर से डीएनए जांच के लिए सहमति नहीं दे सकती और अदालत भी उसे जांच कराने के लिए बाध्य नहीं कर सकती.करीब 14 वर्षों तक चली इस कानूनी लड़ाई का अंत करते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि समय बीतने के साथ मामले की परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं. इसलिए अब डीएनए जांच का आदेश देना न्यायसंगत नहीं होगा.

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फैमिली कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी
यह मामला लखन कुमार मंडल द्वारा दायर एक रिट याचिका से जुड़ा है. उन्होंने गिरिडीह की फैमिली कोर्ट के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें दिसंबर 2011 में उनके बेटे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग खारिज कर दी गई थी.
मामले की सुनवाई झारखंड हाईकोर्ट की न्यायमूर्ति अनुभा रावत चौधरी की एकल पीठ ने की। अदालत ने सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद याचिका खारिज कर दी.
अदालत ने क्या कहा ?
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जब डीएनए जांच की मांग की गई थी, तब संबंधित बच्चा नाबालिग था और उसकी मां उसकी कानूनी अभिभावक होने के नाते उसकी ओर से निर्णय ले सकती थी.
लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है. लंबी न्यायिक प्रक्रिया के दौरान बच्चा वयस्क हो गया है. ऐसे में उसकी मां अब उसकी ओर से डीएनए जांच के लिए सहमति देने की अधिकारिक स्थिति में नहीं है.
अदालत ने यह भी कहा कि यदि कोई व्यक्ति वयस्क हो चुका है, तो उसकी इच्छा के विरुद्ध डीएनए जांच का आदेश नहीं दिया जा सकता.
बेटे को पक्षकार नहीं बनाया गया
अदालत ने यह भी उल्लेख किया कि जब संबंधित बच्चा वयस्क हो गया, तब याचिकाकर्ता ने उसे मामले में पक्षकार नहीं बनाया.इसी वजह से अदालत के पास न तो उसे डीएनए जांच कराने का निर्देश देने का अधिकार है और न ही उसके जांच से इनकार करने की स्थिति में उसकी मां के खिलाफ कोई प्रतिकूल टिप्पणी करने का आधार.
क्या है पूरा मामला ?
अदालती रिकॉर्ड के अनुसार, लखन कुमार मंडल और फूलमती देवी का विवाह 12 जुलाई 2000 को हुआ था.
लखन मंडल का कहना था कि वह जनवरी 2001 से अप्रैल 2002 तक गुजरात के सूरत में काम कर रहे थे. जब वे घर लौटे तो उनकी पत्नी गर्भवती थीं. इसके बाद उन्होंने पत्नी पर विवाहेतर संबंध (व्यभिचार) का आरोप लगाया और बच्चे के पितृत्व पर सवाल उठाया.बच्चे के जन्म के करीब छह वर्ष बाद, 2008 में उन्होंने तलाक का मुकदमा दायर किया.
2010 में की थी डीएनए टेस्ट की मांग
तलाक के मामले की सुनवाई के दौरान गवाहों के बयान दर्ज होने के बाद 2010 में लखन मंडल ने अदालत से बच्चे का डीएनए टेस्ट कराने की मांग की. उस समय बच्चा लगभग आठ वर्ष का था. हालांकि, गिरिडीह की फैमिली कोर्ट ने दिसंबर 2011 में यह मांग खारिज कर दी. इसके बाद लखन मंडल ने 2012 में झारखंड हाईकोर्ट का रुख किया और फैमिली कोर्ट के आदेश को चुनौती दी.
14 साल में बदल गई मामले की तस्वीर
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में इस मामले को न्यायिक प्रक्रिया में होने वाली देरी का उदाहरण भी माना. अदालत ने कहा कि जब यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा, तब बच्चा नाबालिग था. लेकिन याचिका पर अंतिम निर्णय आने तक वह 24 वर्ष का वयस्क हो चुका है.
इस दौरान मामले की कानूनी और व्यावहारिक परिस्थितियां पूरी तरह बदल गईं, जिसके कारण अदालत के सामने पहले जैसी स्थिति नहीं रही.
फैसले का क्या अर्थ है ?
हाईकोर्ट के इस फैसले से यह स्पष्ट होता है कि किसी व्यक्ति के वयस्क होने के बाद उसकी सहमति के बिना डीएनए जांच का आदेश सामान्य परिस्थितियों में नहीं दिया जा सकता.
साथ ही अदालत ने यह भी संकेत दिया कि लंबी न्यायिक प्रक्रिया कई बार मामलों की मूल प्रकृति को बदल देती है, जिससे शुरुआती मांगों पर बाद में फैसला देना व्यावहारिक और कानूनी रूप से संभव नहीं रह जाता
