RANCHI : आज 10 मई को देशभर में मदर्स डे मनाया जा रहा है. इस खास मौके पर मां के सम्मान में कई कार्यक्रम आयोजित किए जा रहे हैं. कहीं लोग अपनी मां को उपहार देकर खुशियां बांट रहे हैं, तो कहीं मां के त्याग और समर्पण को याद कर उन्हें सम्मानित किया जा रहा है. भारत में मां को ईश्वर से भी ऊंचा दर्जा दिया जाता है, लेकिन इसके बावजूद समाज में कई ऐसी माताएं हैं, जो अपने ही परिवार से दूर वृद्धाश्रम में जीवन बिताने को मजबूर हैं. देवघर के चांदडीह स्थित वृद्धाश्रम में रह रही कई बुजुर्ग माताओं की कहानी भी कुछ ऐसी ही है. मदर्स डे के अवसर पर ईटीवी भारत की टीम ने वृद्धाश्रम पहुंचकर वहां रह रही महिलाओं से बातचीत की.

देवघर के चांदडीह वृद्धाश्रम में माताओं ने साझा की अपनी पीड़ा,
वृद्धाश्रम में रह रहीं बुजुर्ग सरस्वती देवी ने बताया कि उनके बेटे ने उनके साथ मारपीट की और घर से बाहर निकाल दिया. इसके बाद उनके पास वृद्धाश्रम में रहने के अलावा कोई दूसरा विकल्प नहीं बचा. वहीं एक अन्य महिला ने बताया कि उनकी एक बेटी है, लेकिन परिस्थितियों के कारण वह बेटी के साथ नहीं रह पा रही हैं और वृद्धाश्रम में आश्रय लेना पड़ा. वृद्धाश्रम में रह रही अन्य महिलाओं ने भी मदर्स डे के मौके पर लोगों से अपील की कि माता-पिता को कभी अकेला न छोड़ें और उनका सम्मान करें.
इस मौके पर समाजसेवी ललिता देवी ने कहा कि माता-पिता की जिम्मेदारी केवल बेटे की नहीं, बल्कि बेटा और बेटी दोनों की समान रूप से होती है. समाज में अब भी कई माता-पिता बेटी के घर रहने को सहज नहीं मानते, जबकि इस सोच को बदलने की जरूरत है. माता-पिता को बेटी के घर भी पूरे अधिकार और सम्मान के साथ रहने का हक है. मदर्स डे के अवसर पर स्थानीय निवासी रोहित यादव ने अपनी शादी की सालगिरह वृद्धाश्रम में रह रही माताओं के साथ मनाई. उन्होंने कहा कि माता-पिता से बढ़कर दुनिया में कोई दौलत नहीं है. इसलिए उन्होंने इस खास दिन को वृद्धाश्रम की माताओं के साथ बिताने का निर्णय लिया, ताकि उनके चेहरों पर मुस्कान लाई जा सके.
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वृद्धाश्रम के सहायक पूरण कुमार ने कहा कि असहाय और अकेलेपन का जीवन जी रहे बुजुर्गों को देखकर मन दुखी हो जाता है. हर संतान का कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता का सहारा बने, खासकर बुढ़ापे में. उन्होंने कहा कि वृद्धाश्रम में सेवा कार्य करने से उन्हें आत्मिक संतोष मिलता है. हालांकि देवघर के वृद्धाश्रमों में बुजुर्गों के लिए रहने और खाने-पीने की बेहतर सुविधाएं उपलब्ध हैं, लेकिन उनकी असली खुशी तभी लौटेगी, जब बच्चे अपने माता-पिता को बोझ नहीं, बल्कि अपनी जिम्मेदारी और आशीर्वाद समझेंगे.
