RANCHI : जब भी कोई इंसान फोन पर ‘इनकॉग्निटो मोड’ ऑन करता है या वीपीएन लगाकर किसी एडल्ट साइट पर जाता है, तो दिमाग में क्या होता है? थोड़ी सी प्राइवेसी और टाइमपास. समाज में इन साइट्स को इतना बड़ा ‘टैबू’ माना जाता है कि कोई नाम तक नहीं लेता. लेकिन ठहरिए, जरा लंबी सांस लीजिए! हमारी जांच एजेंसियों की हालिया पड़ताल में एक ऐसा सच सामने आया है जो होश उड़ा देगा. जिस एडल्ट कॉर्नर को दुनिया सबसे प्राइवेट और सीक्रेट मानती है, आतंकी संगठन उसी जगह को अपना नया कंट्रोल रूम बनाकर बैठ गए हैं.
व्हाट्सएप से बोर, पोर्न साइट्स की ओर
अब आप सोच रहे होंगे कि भाई, व्हाट्सएप, टेलीग्राम और सिग्नल के जमाने में ये आतंकी एडल्ट साइट्स के चक्कर क्यों काट रहे हैं? असली गॉसिप यहीं से शुरू होती है. पिछले कुछ सालों में भारतीय सुरक्षा एजेंसियों की साइबर सर्विलांस इतनी टाइट हो चुकी है कि जैसे ही मेनस्ट्रीम सोशल मीडिया पर कोई संदिग्ध हलचल होती है, वो तुरंत रडार पर आ जाती है. जब पुराने अड्डों पर शिकंजा कसा, तो सीमा पार बैठे हैंडलर्स ने सोचा ‘ऐसी जगह चुनो जहां किसी की नजर न पड़े और जहां करोड़ों लोग पहले से अपनी पहचान छुपाकर घूम रहे हों. बस, उन्होंने भारत में बैन साइट्स के ट्रैफिक को ही अपनी ढाल बना लिया.
चैट बॉक्स का खतरनाक हनीट्रैप
खेल कितना शातिर है, इसकी इनसाइड स्टोरी समझिए. जब कोई बंदा वीपीएन लगाकर इन साइट्स को खोलता है, तो स्क्रीन पर छोटे-छोटे चैट बॉक्स पॉप-अप होते हैं फाइंड फ्रेंड्स नियर यू या चैट विद लोकल गर्ल्स. आम यूजर को लगता है कि वो किसी अनजान शख्स से फ्लर्टिंग या डेटिंग चैट कर रहा है. लेकिन उस प्रोफाइल के पीछे कोई लड़की नहीं, बल्कि सीमा पार बैठा एक आतंकी हैंडलर होता है! लाखों जीबी के डेटा ट्रैफिक के बीच किसी ऐसी चैट को पकड़ना भूसे के ढेर में सुई खोजने जैसा है. यूजर सोचता है कि वो टाइमपास कर रहा है, जबकि असल में वो एक खतरनाक ट्रैप में फंस रहा होता है.
डार्क वेब और ‘घोस्ट मोड’ का खेल
कहानी का ट्विस्ट यहीं खत्म नहीं होता बॉस! जब हैंडलर को लगता है कि सामने वाला बंदा उसकी बातों में आ चुका है, तो वह उसे इन साइट्स से हटाकर ऐसे सीक्रेट डार्क-वेब ऐप्स पर ले जाता है जिनका नाम भी आम लोगों ने नहीं सुना होगा. ‘कोटैक्स’ और ‘कोनियन’ जैसे टोर ऐप्स, जो दुनिया भर के अलग-अलग सर्वर्स से ट्रैफिक घुमा देते हैं. ऊपर से ऐसे प्राइवेसी ऐप्स इस्तेमाल हो रहे हैं जहां आईडी बनाने के लिए न तो कोई सिम कार्ड चाहिए, न फोन नंबर और न ही ईमेल आईडी! यानी पूरी तरह से ‘घोस्ट मोड’ न कोई डिजिटल निशान, न कोई पहचान बस स्क्रीन पर गायब होते मैसेज और मिलिट्री-ग्रेड एन्क्रिप्शन.
2G नेटवर्क और वर्चुअल सिम का जाल
हैरानी की बात यह है कि यह पूरा सिस्टम उस नेटवर्क पर भी मक्खन जैसा चलता है जहां सिग्नल के नाम पर सिर्फ 2G या धीमा इंटरनेट होता है. इसके साथ ही विदेशी फर्जी नंबरों से बनने वाले ‘वर्चुअल सिम्स’ का ऐसा मायाजाल बुना गया है जिसे ट्रैक करना साइबर एक्सपर्ट्स के लिए भी सिरदर्द बन चुका है. जिसे लोग महज एक एडल्ट वेबसाइट समझकर स्क्रोल कर देते हैं, उसे हैंडलर्स ने युवाओं का ब्रेनवॉश करने और नए लड़के रिक्रूट करने का सीक्रेट कैंप बना दिया है.
अब आगे क्या?
आतंकवाद अब सिर्फ जंगलों या बंदूकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि वो मोबाइल के सबसे प्राइवेट ब्राउजर टैब तक घुस चुका है. जो चीज समाज में जितनी ज्यादा छुपाई जाती है, आतंकियों ने उसी शर्म और प्राइवेसी को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है. ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि क्या सिर्फ वेबसाइट्स ब्लॉक करने से यह खेल रुकेगा, या फिर हमें अपने डिजिटल डिफेंस को पूरी तरह नए सिरे से तैयार करना पड़ेगा?
