RANCHI : झारखंड में वित्तीय वर्ष 2026-27 के दौरान योजना बजट खर्च करने की रफ्तार को लेकर सवाल उठ रहे हैं. 22 अक्टूबर 2026 तक राज्य के पुनरीक्षित योजना बजट का सिर्फ 29.38 प्रतिशत हिस्सा खर्च हो पाया था. इस अवधि में 1,06,200.94 करोड़ रुपये के योजना बजट के मुकाबले 31,196.72 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे. खर्च की धीमी रफ्तार को देखते हुए वित्त मंत्री ने विकास आयुक्त को पत्र लिखकर कम खर्च करने वाले विभागों की समीक्षा करने और दिसंबर 2026 तक लगभग 75 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य हासिल करने पर जोर दिया है.
वित्त मंत्री ने निर्माण कार्यों से जुड़े विभागों में निविदा प्रक्रिया में लगने वाले समय पर भी चिंता जताई है. संबंधित विभागों में निविदा प्रक्रिया 60 दिनों के भीतर पूरी करने पर जोर दिया गया है. ऐसे में सवाल है कि योजनाओं के लिए राशि आवंटित होने के बावजूद खर्च की गति धीमी क्यों है और इसका असर विकास कार्यों पर कितना पड़ रहा है.

कुल बजट और योजना बजट में अंतर
झारखंड सरकार ने वित्तीय वर्ष 2026-27 के लिए 1,58,560 करोड़ रुपये का बजट पेश किया है. इसे ‘अबुआ दिशोम बजट’ नाम दिया गया है. हालांकि, खर्च की समीक्षा में जिस राशि का उल्लेख किया गया है, वह पूरे राज्य के बजट से अलग पुनरीक्षित योजना बजट है. इस योजना बजट का आकार 1,06,200.94 करोड़ रुपये था. 22 अक्टूबर तक इसमें से 31,196.72 करोड़ रुपये खर्च हुए थे। इस तरह खर्च का अनुपात 29.38 प्रतिशत रहा. इसका अर्थ है कि योजना बजट के प्रत्येक 100 रुपये में से लगभग 29 रुपये 38 पैसे खर्च किए गए थे. शेष राशि उस तारीख तक खर्च नहीं हुई थी.
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यह आंकड़ा अपने आप में यह साबित नहीं करता कि योजनाएं बंद हैं या राशि का दुरुपयोग हुआ है. हालांकि, यह जरूर बताता है कि योजना बजट के इस्तेमाल की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत है. इसके लिए विभागवार खर्च, लंबित परियोजनाओं और जमीन पर हुए काम की स्थिति का आकलन जरूरी है.
छह महीने बाद भी 50 प्रतिशत खर्च का लक्ष्य पूरा नहीं
वित्त मंत्री ने अपने पत्र में वर्ष 2015 के वित्त विभागीय आदेश का उल्लेख किया है. इस आदेश के अनुसार, वित्तीय वर्ष के शुरुआती छह महीनों तक योजना मद की लगभग 50 प्रतिशत राशि खर्च करने का लक्ष्य निर्धारित किया गया था. 30 सितंबर 2026 तक वित्तीय वर्ष के छह महीने पूरे हो चुके थे, लेकिन योजना बजट का खर्च इस लक्ष्य तक नहीं पहुंच पाया. 22 अक्टूबर तक भी खर्च 29.38 प्रतिशत ही रहा.
इस स्थिति में यह जानना महत्वपूर्ण है कि किन विभागों में योजनाओं की प्रशासनिक स्वीकृति, तकनीकी मंजूरी, निविदा या भुगतान की प्रक्रिया लंबित है। इन कारणों की पहचान के बिना खर्च की गति बढ़ाने की कोशिशों का असर सीमित रह सकता है.
दिसंबर तक 75 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य
खर्च की धीमी रफ्तार के बीच वित्त मंत्री ने दिसंबर 2026 तक लगभग 75 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य रखा है. इसके लिए विकास आयुक्त से कम खर्च करने वाले विभागों के सचिवों के साथ समीक्षा बैठक करने और देरी के कारणों की पड़ताल करने पर जोर दिया गया है. 22 अक्टूबर तक 31,196.72 करोड़ रुपये खर्च हुए थे. दिसंबर तक 75 हजार करोड़ रुपये के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए लगभग 43,803 करोड़ रुपये अतिरिक्त खर्च करने होंगे.
इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए विभागों को लंबित योजनाओं की पहचान, आवश्यक मंजूरियों की प्रक्रिया तेज करने और निविदाओं के निष्पादन पर ध्यान देना होगा. साथ ही, खर्च बढ़ाने के प्रयासों के दौरान निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और वित्तीय पारदर्शिता सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा.
निविदा प्रक्रिया में देरी पर सवाल
वित्त मंत्री के पत्र में निर्माण कार्यों से जुड़े कुछ विभागों में निविदा प्रक्रिया पूरी होने में छह महीने से लेकर डेढ़ वर्ष तक लगने का उल्लेख किया गया है. इस देरी को कम करने के लिए संबंधित विभागों में हाल की निविदाओं का निष्पादन 60 दिनों के भीतर करने पर जोर दिया गया है.
निविदा प्रक्रिया में देरी से परियोजनाओं की शुरुआत और उनके लिए निर्धारित राशि के इस्तेमाल पर असर पड़ सकता है. हालांकि, प्रत्येक मामले में देरी का कारण अलग हो सकता है. इसलिए यह देखना जरूरी होगा कि किन परियोजनाओं में तकनीकी स्वीकृति, प्रशासनिक मंजूरी, भूमि उपलब्धता या अन्य कारणों से काम रुका हुआ है. सरकार के सामने चुनौती केवल समय-सीमा तय करने की नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करने की भी है कि निविदाएं निर्धारित अवधि में पूरी हों और परियोजनाओं पर काम समय पर शुरू हो.
पेयजल विभाग में सबसे कम खर्च
विभागवार उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, पेयजल एवं स्वच्छता विभाग में खर्च की दर सबसे कम रही. विभाग को 5,200.01 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे, जबकि 22 अक्टूबर तक खर्च सिर्फ 4.88 प्रतिशत था. ग्रामीण विकास विभाग को 14,923.94 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे। इसमें खर्च 11.59 प्रतिशत रहा. पथ निर्माण विभाग के 6,000 करोड़ रुपये के आवंटन के मुकाबले 19.79 प्रतिशत राशि खर्च हुई. कृषि, पशुपालन और संबंधित क्षेत्रों के लिए 4,281.93 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. इस मद में खर्च 21.40 प्रतिशत रहा. इन विभागों की योजनाओं का संबंध ग्रामीण बुनियादी ढांचे, पेयजल, सड़क निर्माण और कृषि से है। इसलिए कम खर्च की वजहों को समझना और परियोजनाओं की वास्तविक प्रगति सामने लाना महत्वपूर्ण है.
स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याण विभागों की स्थिति
स्वास्थ्य, चिकित्सा शिक्षा एवं परिवार कल्याण विभाग को 7,990.30 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे. 22 अक्टूबर तक इस राशि का 24.81 प्रतिशत खर्च हुआ था. उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग में 2,564.45 करोड़ रुपये के आवंटन के मुकाबले खर्च 26.17 प्रतिशत रहा. शहरी विकास एवं आवास विभाग में 3,919 करोड़ रुपये के आवंटन पर 15.94 प्रतिशत खर्च हुआ.
अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अल्पसंख्यक एवं पिछड़ा वर्ग कल्याण विभाग में 3,568.19 करोड़ रुपये के आवंटन के मुकाबले खर्च 15.69 प्रतिशत रहा. वहीं, खाद्य, सार्वजनिक वितरण एवं उपभोक्ता मामले विभाग में 2,887.27 करोड़ रुपये के आवंटन पर खर्च 16.54 प्रतिशत दर्ज किया गया. ये आंकड़े कई महत्वपूर्ण विभागों में खर्च की धीमी रफ्तार की ओर संकेत करते हैं. हालांकि, अलग-अलग विभागों की योजनाओं, भुगतान के चरणों और कार्यों की प्रकृति में अंतर होता है. इसलिए खर्च के प्रतिशत के साथ-साथ परियोजनाओं की भौतिक प्रगति की जानकारी भी जरूरी है.
पिछले वित्तीय वर्ष में भी पूरा बजट खर्च नहीं हुआ
वित्त मंत्री ने वित्तीय वर्ष 2025-26 का भी उल्लेख किया है. उनके पत्र के मुताबिक, उस वर्ष योजना बजट का लगभग 76 प्रतिशत ही खर्च हो पाया था. मौजूदा वित्तीय वर्ष में भी अक्टूबर के दूसरे पखवाड़े तक खर्च 29.38 प्रतिशत रहने से विभागीय कार्ययोजना और निगरानी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं. सरकार को यह स्पष्ट करना होगा कि पिछले वित्तीय वर्ष में सामने आई कमियों को दूर करने के लिए क्या कदम उठाए गए हैं. नियमित समीक्षा, लंबित निविदाओं की निगरानी और विभागवार प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक करना इस दिशा में उपयोगी कदम हो सकते हैं.
मंत्रियों और अधिकारियों की जवाबदेही भी अहम
बजट खर्च की समीक्षा के साथ यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि जिन विभागों में खर्च की रफ्तार कम है, वहां देरी के लिए जिम्मेदार कारण क्या हैं. विभागीय मंत्री, सचिव और संबंधित अधिकारी योजनाओं की निगरानी तथा प्रशासनिक प्रक्रियाओं को समय पर पूरा कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं. हालांकि, केवल कम खर्च के आंकड़ों के आधार पर किसी व्यक्ति की लापरवाही या भ्रष्टाचार का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता. इसके लिए विभागीय रिकॉर्ड, परियोजनाओं की स्थिति और देरी के कारणों की जांच जरूरी है. सरकार यदि विभागवार जानकारी सार्वजनिक करे कि कितनी निविदाएं लंबित हैं, कितनी परियोजनाएं शुरू हुई हैं, कितना काम पूरा हुआ है और कहां प्रशासनिक अड़चनें हैं, तो जवाबदेही की स्थिति अधिक स्पष्ट हो सकती है.
अब नजर दिसंबर के लक्ष्य पर
झारखंड सरकार के सामने अब दोहरी चुनौती है। एक ओर योजना बजट खर्च करने की रफ्तार बढ़ानी है, वहीं दूसरी ओर यह सुनिश्चित करना है कि राशि का इस्तेमाल पारदर्शी तरीके से और निर्धारित गुणवत्ता के अनुरूप हो. दिसंबर 2026 तक लगभग 75 हजार करोड़ रुपये खर्च करने का लक्ष्य कितना पूरा होता है, यह आने वाले महीनों के आंकड़ों से स्पष्ट होगा. लेकिन खर्च की सफलता का आकलन केवल राशि के आधार पर नहीं, बल्कि इस आधार पर भी किया जाना चाहिए कि उससे कितनी परियोजनाएं आगे बढ़ीं और आम लोगों को कितना लाभ मिला. बजट में राशि आवंटित होना विकास की शुरुआत है. उसकी वास्तविक सफलता तब है, जब योजनाएं समय पर पूरी हों और उनका लाभ लोगों तक पहुंचे.
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