RANCHI : झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी इन दिनों मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत को लेकर दिए गए अपने बयान के कारण चर्चा में हैं. एक वीडियो में इरफान अंसारी मध्य प्रदेश सरकार से सवाल करते दिखाई देते हैं-क्या आदिवासी होना पाप है? क्या दलित होना पाप है? क्या मुसलमान का बच्चा होना पाप है? उनका यह बयान बालाघाट में बच्चों की मौत के मामले को लेकर आया है. इरफान अंसारी ने इस घटना के लिए मध्य प्रदेश सरकार की कथित लापरवाही पर सवाल उठाए और मुख्यमंत्री तथा स्वास्थ्य मंत्री से जवाब मांगा.

उन्होंने पीड़ित परिवारों के लिए पांच-पांच करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग भी की.साथ ही कहा कि वह ‘गार्जियन’ बनकर मध्य प्रदेश जाएंगे. मध्य प्रदेश सरकार से सवाल पूछना अपने आप में गलत नहीं है. किसी भी राज्य में बच्चों की मौत होती है और यदि उसमें सरकारी लापरवाही की बात सामने आती है, तो सरकार से जवाबदेही तय करने की मांग होनी ही चाहिए. लेकिन इरफान अंसारी के बयान के बाद झारखंड में भी उनसे एक सवाल पूछा जा रहा है,जब अपने ही राज्य में एम्बुलेंस की कमी या स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली को लेकर सवाल उठते हैं, तब स्वास्थ्य मंत्री की जवाबदेही क्या होगी?
दूसरे राज्य पर सवाल,अपने राज्य का हिसाब कितना ?
इरफान अंसारी फिलहाल झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री हैं. ऐसे में मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाने के साथ-साथ उनके सामने झारखंड की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर उठने वाले सवालों का जवाब देना भी स्वाभाविक है. झारखंड के ग्रामीण और दूरदराज के इलाकों में एम्बुलेंस सेवा को लेकर कई बार शिकायतें सामने आती रही हैं. कहीं समय पर एम्बुलेंस नहीं पहुंचने का आरोप लगता है, तो कहीं खराब सड़क और दुर्गम रास्तों के कारण मरीजों को अस्पताल तक पहुंचाने में परेशानी होती है.
गुमला की 15 वर्षीय शिवानी का मामला भी इसी संदर्भ में उठाया जा रहा है. आरोप है कि एम्बुलेंस उपलब्ध नहीं होने के कारण उसकी जान चली गई. इस मामले में सवाल यह है कि, क्या शिवानी के परिवार को सरकार की ओर से कोई आर्थिक सहायता मिली? अगर मिली, तो कितनी? और अगर नहीं मिली, तो क्यों? जब मध्य प्रदेश में बच्चों की मौत के मामले में इरफान अंसारी पांच करोड़ रुपये के मुआवजे की मांग कर रहे हैं, तब झारखंड में एम्बुलेंस नहीं मिलने से जान गंवाने वाले परिवारों के लिए सरकार की नीति क्या है?
108 पर फोन के बाद भी एम्बुलेंस नहीं पहुंचने का आरोप
पूर्वी सिंहभूम के चीटामाटी टोला का मामला भी स्वास्थ्य व्यवस्था की जमीनी स्थिति पर सवाल खड़ा करता है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि 108 पर फोन करने के बावजूद एम्बुलेंस समय पर नहीं पहुंची. इसके बाद ग्रामीणों को करीब चार किलोमीटर के दुर्गम रास्ते पर मरीज को खटिया के सहारे ले जाना पड़ा. यह तस्वीर सिर्फ एक मरीज की परेशानी नहीं दिखाती,बल्कि यह सवाल भी उठाती है कि राज्य के दूरदराज के इलाकों में आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाएं कितनी प्रभावी हैं, कागज पर 108 एम्बुलेंस सेवा मौजूद है,लेकिन सवाल यह है कि जरूरत के वक्त वह मरीज तक कितनी जल्दी पहुंचती है?
एम्बुलेंस को धक्का देकर चालू करने की तस्वीरें भी चर्चा में
झारखंड में एम्बुलेंस की स्थिति को लेकर समय-समय पर ऐसे मामले भी सामने आते रहे हैं, जहां खराब या तकनीकी समस्या से जूझ रही एम्बुलेंस के कारण मरीजों को परेशानी उठानी पड़ती है.ऐसे में इरफान अंसारी का मध्य प्रदेश की स्वास्थ्य व्यवस्था पर मुखर होना राजनीतिक बहस को जन्म देता है. आलोचकों का कहना है कि दूसरे राज्य की सरकार पर सवाल उठाना आसान है,लेकिन अपने विभाग की कमियों और जमीनी समस्याओं पर जवाब देना उससे बड़ी जिम्मेदारी है.
क्या यह राजनीतिक बयानबाजी है?
इरफान अंसारी के बयान का एक राजनीतिक पहलू भी है.मध्य प्रदेश में बीजेपी की सरकार है और झारखंड में सत्ता पक्ष के नेता के तौर पर इरफान अंसारी का वहां की सरकार पर हमला करना राजनीतिक रूप से स्वाभाविक माना जा सकता है.
लेकिन सवाल यह है कि क्या स्वास्थ्य जैसे संवेदनशील विषय को राजनीतिक बयानबाजी से आगे ले जाकर सरकारों की वास्तविक जवाबदेही का मुद्दा बनाया जा सकता है? यदि बालाघाट में सरकारी लापरवाही से बच्चों की मौत हुई है, तो दोषियों पर कार्रवाई होनी चाहिए और पीड़ित परिवारों को उचित मुआवजा मिलना चाहिए.लेकिन इसी कसौटी पर झारखंड की घटनाओं को भी देखा जाना चाहिए.
अगर झारखंड में किसी मरीज को समय पर एम्बुलेंस नहीं मिलती,अगर ग्रामीणों को मरीज को खटिया पर ढोकर अस्पताल ले जाना पड़ता है और अगर स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी के कारण किसी की जान जाती है तो जिम्मेदारी किसकी होगी?
‘गार्जियन’ बनने से पहले अपने राज्य की जिम्मेदारी ?
इरफान अंसारी ने मध्य प्रदेश जाने और वहां ‘गार्जियन’ की भूमिका निभाने की बात कही है.यह बयान राजनीतिक रूप से भले ही प्रभावी हो लेकिन उनके सामने झारखंड का सवाल भी उतना ही बड़ा है.वे जिस संवेदनशीलता के साथ मध्य प्रदेश में आदिवासी बच्चों की मौत पर सवाल उठा रहे हैं, क्या उसी संवेदनशीलता के साथ झारखंड में स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी से जूझ रहे परिवारों की आवाज भी उठाई जाएगी?
क्योंकि स्वास्थ्य मंत्री की जिम्मेदारी सिर्फ दूसरे राज्यों की कमियां गिनाने तक सीमित नहीं होती। अपने राज्य के अस्पतालों, एम्बुलेंस, डॉक्टरों और ग्रामीण स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति सुधारना भी उसी जिम्मेदारी का हिस्सा है इरफान अंसारी के बयान ने इसलिए एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है
क्या ‘आदिवासी होना पाप है?’ का सवाल सिर्फ मध्य प्रदेश से पूछा जाना चाहिए या झारखंड में भी इसी सवाल के साथ सरकार की जवाबदेही तय होनी चाहिए? और अंत में इरफान अंसारी की राजनीतिक महत्वाकांक्षा पर किया गया तंज भी चर्चा में है। सवाल उठाया जा रहा है कि क्या वे भविष्य में केंद्र की राजनीति में बड़ी भूमिका देख रहे हैं?
फिलहाल वे झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री हैं और झारखंड की जनता उनसे सबसे पहले यही उम्मीद करेगी कि राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्था बेहतर हो, जरूरत के समय एम्बुलेंस उपलब्ध हो और किसी गरीब परिवार को इलाज के लिए खटिया के सहारे अस्पताल तक न पहुंचना पड़े. क्योंकि जनता को सिर्फ बयान नहीं,समय पर इलाज और जमीन पर काम करने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था चाहिए.
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