रांची : झारखंड में कभी माओवादी गतिविधियों का बड़ा नाम रहे सतेंद्र यादव उर्फ छोटा विकास की बेटी की पढ़ाई का खर्च अब पुलिस मुख्यालय उठाएगा. छोटा विकास ने वर्ष 2016 में आत्मसमर्पण कर हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया था. पुलिस मुख्यालय की इस पहल का उद्देश्य उसके परिवार की अगली पीढ़ी को शिक्षा से जोड़ना और आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के परिवारों में भरोसा कायम करना बताया जा रहा है.

छोटा विकास की बेटी रांची के सेंट जेवियर कॉलेज में बीएससी पार्ट-2 की पढ़ाई कर रही हैं. पुलिस के मुताबिक, वह पढ़ाई में बेहतर प्रदर्शन करती रही हैं और अपनी कक्षा में शीर्ष विद्यार्थियों में रही हैं. फिलहाल उनकी कॉलेज फीस के लिए करीब 50 हजार रुपये की राशि उपलब्ध कराई जा रही है. इसके बाद थर्ड सेमेस्टर समेत आगे की पढ़ाई का खर्च भी पुलिस मुख्यालय की ओर से उठाया जाएगा. इस संबंध में स्पेशल ब्रांच के डीआईजी नौशाद आलम ने सहयोग राशि से जुड़े पत्र पर हस्ताक्षर कर उसे पुलिस मुख्यालय भेज दिया है. बताया गया है कि जल्द ही कॉलेज में फीस की राशि जमा करा दी जाएगी.
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आत्मसमर्पण करने वालों के परिवारों को भरोसा देने की कोशिश
पुलिस अधिकारियों का कहना है कि आत्मसमर्पण करने वाले नक्सलियों के बच्चों की पढ़ाई प्रभावित नहीं होनी चाहिए. ऐसे परिवारों के बच्चों को शिक्षा का अवसर देकर उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने की कोशिश की जा रही है. पुलिस मुख्यालय की इस पहल को आत्मसमर्पण नीति के व्यापक उद्देश्य से भी जोड़कर देखा जा रहा है. इसके जरिए यह संदेश देने की कोशिश है कि हिंसा का रास्ता छोड़कर मुख्यधारा में लौटने वाले लोगों के बच्चों के भविष्य को लेकर सरकार और पुलिस गंभीर हैं.
कौन है छोटा विकास?
पुलिस रिकॉर्ड के मुताबिक, छोटा विकास का वास्तविक नाम सतेंद्र यादव है. उसे दिनेश यादव उर्फ चश्मा के नाम से भी जाना जाता रहा है. वह पलामू जिले के मनातू थाना क्षेत्र के भीतरडीहा गांव का रहने वाला है. वह भाकपा माओवादी के बिहार-झारखंड और उत्तरी छत्तीसगढ़ स्पेशल एरिया कमेटी से जुड़ा रहा था. राज्य सरकार ने उसके ऊपर 25 लाख रुपये का इनाम घोषित किया था.
वर्ष 2016 में उसने लातेहार में तत्कालीन डीआईजी साकेत कुमार सिंह और तत्कालीन पुलिस अधीक्षक अनूप बिरथरे के सामने आत्मसमर्पण किया था.पुलिस के अनुसार, छोटा विकास करीब एक दशक तक माओवादी संगठन में सक्रिय रहा. वर्ष 1998 से 2015 के बीच पलामू, लातेहार और लोहरदगा में उसके खिलाफ करीब दो दर्जन मामले दर्ज थे.
पुलिस का दावा है कि संगठन में रहते हुए वह पलामू प्रमंडल के अलावा बिहार और छत्तीसगढ़ में माओवादी गतिविधियों से जुड़ी कई घटनाओं में शामिल रहा था.बाद में सरकार की आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से प्रभावित होकर उसने हिंसा का रास्ता छोड़ मुख्यधारा में लौटने का फैसला किया.अब उसके परिवार की अगली पीढ़ी की शिक्षा का खर्च पुलिस मुख्यालय द्वारा उठाया जाना इस बात का संकेत है कि आत्मसमर्पण के बाद पुनर्वास की नीति केवल पूर्व नक्सली तक सीमित नहीं रखी जा रही, बल्कि उसके परिवार के भविष्य को भी इससे जोड़ने की कोशिश की जा रही है.
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