RANCHI : आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की बदहाली कोई नई समस्या नहीं है. देश के कई हिस्सों में आज भी ऐसे गांव हैं, जहां बीमारी की स्थिति में अस्पताल तक पहुंचना ही सबसे बड़ी चुनौती बन जाता है. कहीं सड़क नहीं है, कहीं एंबुलेंस नहीं पहुंचती और कहीं प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र तक मरीज को कई किलोमीटर पैदल या कंधे पर ढोकर ले जाना पड़ता है. लेकिन जब ऐसी परिस्थितियों में किसी मासूम की मौत हो जाती है, तो सवाल केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर नहीं उठता. सवाल यह भी उठता है कि राजनीतिक दल इन मौतों और व्यवस्थागत कमियों को किस नजरिए से देखते हैं.

हाल के दिनों में मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी बच्चों की मौत को लेकर कांग्रेस ने जिस तरह सरकार को घेरा है, उसने इसी सवाल को फिर सामने ला दिया है.कांग्रेस ने मध्यप्रदेश के बालाघाट की घटनाओं को लेकर प्रदर्शन किया , सरकार से जवाब मांगा और स्वास्थ्य व्यवस्था पर सवाल उठाए. वही पार्टी नेताओं ने जिम्मेदारी तय करने और स्वास्थ्य मंत्री के इस्तीफे की मांग तक की. विपक्ष के तौर पर सरकार से सवाल पूछना लोकतंत्र का जरूरी हिस्सा है. लेकिन यहीं से एक दूसरा सवाल भी पैदा होता है-क्या यही राजनीतिक कसौटी उन राज्यों में भी लागू होती है, जहां कांग्रेस स्वयं सत्तारूढ़ गठबंधन का हिस्सा है?
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बालाघाट में कांग्रेस का विरोध, सवाल स्वास्थ्य व्यवस्था पर
मध्य प्रदेश के बालाघाट में आदिवासी समुदाय से जुड़े बच्चों की मौत के बाद स्वास्थ्य, पोषण और समय पर उपचार उपलब्ध कराने को लेकर गंभीर सवाल उठे हैं. कांग्रेस ने इस मामले को राजनीतिक मुद्दा बनाया और सरकार पर आदिवासी इलाकों की अनदेखी का आरोप लगाया. पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं ने विरोध-प्रदर्शन किए तथा जिम्मेदार अधिकारियों और सरकार से जवाब मांगा. कांग्रेस नेता राहुल गांधी समेत पार्टी के अन्य नेताओं ने भी आदिवासी क्षेत्रों में स्वास्थ्य सुविधाओं की स्थिति को लेकर सवाल उठाए हैं.
विपक्ष के लिए यह स्वाभाविक है कि वह सरकार की नीतियों और प्रशासनिक विफलताओं पर सवाल उठाए. खासकर तब, जब मामला बच्चों की मौत और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं से जुड़ा हो. लेकिन यही सवाल जब दूसरे राज्य में सामने आता है, तो राजनीतिक प्रतिक्रिया का पैमाना क्या होना चाहिए? यहीं से मध्य प्रदेश की घटना की तुलना झारखंड के लातेहार से की जा रही है.
लातेहार का भोकाखाड़ : सड़क से पहले पहुंचती है बीमारी
झारखंड के लातेहार जिले के भोकाखाड़ गांव की तस्वीर किसी भी सरकार के लिए चिंता का विषय होनी चाहिए. बताया जाता है कि यह गांव दुर्गम पहाड़ी इलाके में स्थित है और यहां तक पहुंचने के लिए ग्रामीणों को कई किलोमीटर कठिन रास्ता तय करना पड़ता है. स्थानीय लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या सड़क और स्वास्थ्य सुविधा की पहुंच की है.मरीज की हालत गंभीर होने पर उसे अस्पताल तक पहुंचाना अपने आप में एक चुनौती बन जाता है.कई बार ग्रामीण मरीज को कंधे या खटोले के सहारे ले जाने को मजबूर होते हैं.
ऐसे में अगर उपचार तक पहुंचने में देरी होती है, तो इसका सीधा असर मरीज की जान पर पड़ सकता है. भोकाखाड़ में कथित तौर पर कम समय के भीतर तीन बच्चों की मौत ने इस पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर सवाल खड़े किए हैं. अगर इन मौतों की परिस्थितियों की स्वतंत्र जांच में यह सामने आता है कि समय पर स्वास्थ्य सुविधा नहीं मिलने या अस्पताल तक पहुंचने में हुई देरी ने उनकी स्थिति को गंभीर बनाया, तो यह केवल किसी एक परिवार की त्रासदी नहीं होगी. यह उस पूरी व्यवस्था पर सवाल होगा, जो आज भी दूरदराज के आदिवासी इलाकों तक बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने में संघर्ष कर रही है.
फिर सवाल कांग्रेस से क्यों?
यहीं राजनीतिक सवाल खड़ा होता है. झारखंड में कांग्रेस, झारखंड मुक्ति मोर्चा के नेतृत्व वाली सरकार का हिस्सा है. राज्य के स्वास्थ्य विभाग की जिम्मेदारी कांग्रेस मंत्री डॉ. इरफान अंसारी के पास है. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि यदि मध्य प्रदेश में आदिवासी बच्चों की मौत स्वास्थ्य व्यवस्था की विफलता का मुद्दा है, तो झारखंड में ऐसी घटनाओं को लेकर भी कांग्रेस उतनी ही मुखर क्यों नहीं दिखाई देती? क्या पार्टी झारखंड सरकार से भी वही सवाल पूछेगी, जो वह मध्य प्रदेश की भाजपा सरकार से पूछ रही है? क्या लातेहार के दुर्गम गांवों में सड़क, एंबुलेंस, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और समय पर उपचार की व्यवस्था को लेकर कांग्रेस अपने ही गठबंधन की सरकार से जवाब मांगेगी?
और क्या पार्टी यह सुनिश्चित करने की मांग करेगी कि भविष्य में किसी मरीज को अस्पताल तक पहुंचने के लिए खटोले का सहारा न लेना पड़े? ये सवाल किसी राजनीतिक दल के खिलाफ आरोप नहीं, बल्कि उस राजनीतिक कसौटी की बात करते हैं, जिसे सभी दलों पर समान रूप से लागू किया जाना चाहिए.
सवाल सिर्फ कांग्रेस से नहीं, भाजपा से भी
हालांकि इस पूरे मामले को केवल कांग्रेस के कथित दोहरे रवैये तक सीमित कर देना भी समस्या का पूरा समाधान नहीं है. मध्य प्रदेश में भाजपा लंबे समय से सत्ता में है. ऐसे में वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था, खासकर आदिवासी और दूरदराज के इलाकों में स्वास्थ्य सुविधाओं की जिम्मेदारी सीधे राज्य सरकार की है. अगर किसी आदिवासी इलाके में बच्चों को समय पर उपचार नहीं मिल रहा है, पोषण संबंधी समस्याएं बनी हुई हैं या अस्पताल तक पहुंचने के लिए बुनियादी परिवहन सुविधा नहीं है, तो सरकार को इसका जवाब देना ही होगा.
सरकार का काम केवल अस्पताल बनाना नहीं है. यह भी सुनिश्चित करना है कि अस्पताल तक मरीज पहुंच सके, डॉक्टर उपलब्ध हों, दवाइयां मिलें और आपात स्थिति में समय पर चिकित्सा सहायता मिले.इसी तरह झारखंड में भी सरकार और उसके सहयोगी दलों की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती. अगर लातेहार जैसे दुर्गम इलाकों में आज भी ग्रामीणों को मरीजों को कंधे या खटोले पर ले जाना पड़ रहा है, तो यह विकास के दावों के सामने एक गंभीर सवाल है.
आदिवासी इलाकों में बीमारी से पहले शुरू होती है लड़ाई
आदिवासी बहुल और दुर्गम क्षेत्रों में स्वास्थ्य संकट को केवल डॉक्टर या अस्पताल की कमी के रूप में नहीं देखा जा सकता. यह समस्या सड़क, परिवहन, पेयजल, पोषण, गरीबी, संचार और स्वास्थ्य केंद्रों की दूरी से भी जुड़ी होती है. एक शहर में रहने वाले व्यक्ति के लिए अस्पताल तक पहुंचना कुछ मिनटों या आधे घंटे की बात हो सकती है. लेकिन किसी पहाड़ी गांव के व्यक्ति के लिए यही दूरी कई घंटों की यात्रा में बदल सकती है. और गंभीर बीमारी में यही समय जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर बन सकता है.
इसलिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि कौन-सी पार्टी किस राज्य में सत्ता में है. सवाल यह होना चाहिए कि आदिवासी इलाकों में स्वास्थ्य व्यवस्था कब ऐसी होगी, जहां किसी बच्चे की जान केवल इसलिए न जाए कि अस्पताल तक पहुंचने के लिए सड़क नहीं थी?
राजनीति से ऊपर उठकर देखना होगा दर्द
मध्य प्रदेश में कांग्रेस का सरकार से सवाल पूछना लोकतांत्रिक व्यवस्था में पूरी तरह उचित है. लेकिन उसी कसौटी को झारखंड में भी लागू करना होगा. अगर बालाघाट में आदिवासी बच्चे की मौत सरकार की जवाबदेही का मुद्दा है, तो लातेहार में आदिवासी बच्चों की मौत भी उतनी ही गंभीरता से उठनी चाहिए. और अगर झारखंड सरकार से सवाल उठाने की बारी आती है, तो कांग्रेस को यह बताना होगा कि क्या वह अपने ही गठबंधन की सरकार से भी उतनी ही कठोरता से जवाब मांगेगी?
इसी तरह भाजपा को भी यह समझना होगा कि विपक्ष के सवालों को केवल राजनीति कहकर खारिज करने से स्वास्थ्य व्यवस्था की कमियां खत्म नहीं होतीं. मौत किसी पार्टी की नहीं होती. भूख किसी विचारधारा की नहीं होती. और अस्पताल तक सड़क की जरूरत भी किसी राजनीतिक दल की सदस्यता देखकर तय नहीं होती.आदिवासी परिवार का बच्चा मध्य प्रदेश में हो या झारखंड में-उसकी जिंदगी की कीमत बराबर होनी चाहिए यही लोकतंत्र की असली कसौटी है.
क्योंकि जब किसी मासूम की मौत राजनीतिक दलों के लिए सत्ता और विपक्ष के हिसाब से अलग-अलग महत्व रखने लगे, तब सवाल केवल स्वास्थ्य व्यवस्था पर नहीं रहता. सवाल हमारी राजनीति की संवेदनशीलता पर भी उठता है. आदिवासी का दर्द किसी राजनीतिक दल का हथियार नहीं, बल्कि सरकारों की जवाबदेही का सवाल होना चाहिए.
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