RANCHI : झारखंड की राजनीति में सुदिव्य कुमार सोनू का नाम एक ऐसे नेता के तौर पर याद किया जाएगा, जिन्होंने एक सामान्य कार्यकर्ता के रूप में राजनीतिक सफर शुरू किया और अपनी मेहनत, संघर्ष और जनसेवा के दम पर विधायक से लेकर राज्य सरकार में मंत्री पद तक का सफर तय किया.
सुदिव्य सोनू की राजनीतिक पृष्ठभूमि किसी राजनीतिक परिवार से नहीं जुड़ी थी. उनके परिवार की कई पीढ़ियां सरकारी नौकरी में रहीं. घर में राजनीति को लेकर कोई माहौल नहीं था. इसके बावजूद झारखंड आंदोलन के दौर में कुछ ऐसी परिस्थितियां बनीं, जिन्होंने युवा सुदिव्य के भीतर अपनी माटी और अलग झारखंड राज्य के लिए काम करने का जज्बा पैदा किया.
उत्तर बिहार में पढ़ाई के दौरान मिले तानों ने पैदा की टीस
80 और 90 के दशक में जब सुदिव्य सोनू उत्तर बिहार में पढ़ाई कर रहे थे, तब झारखंड अलग राज्य आंदोलन को लेकर उन्हें अक्सर साथियों के ताने सुनने पड़ते थे. उनसे कहा जाता था, “अलग राज्य बना लोगे.” बताया जाता है कि इन बातों ने उनके भीतर एक टीस पैदा कर दी थी. धीरे-धीरे झारखंड और अलग राज्य की मांग को लेकर उनकी रुचि और सक्रियता बढ़ने लगी. इसी दौर में साल 1989 में उनकी मुलाकात झामुमो के संस्थापक और दिशोम गुरु शिबू सोरेन से हुई. बताया जाता है कि डीएसपी बरनाड कीचिया के आवास पर हुई यह मुलाकात सुदिव्य सोनू के राजनीतिक जीवन का निर्णायक मोड़ साबित हुई.
शिबू सोरेन की एक बात ने बदल दी दिशा
कहा जाता है कि मुलाकात के दौरान शिबू सोरेन को जब पता चला कि सुदिव्य सोनू पढ़े-लिखे युवा हैं, तो उन्होंने उनके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा था. अगर तुम्हारे जैसे पढ़े-लिखे लोग अलग राज्य के आंदोलन में नहीं आएंगे, तो आंदोलन का विस्तार कैसे होगा. गुरु जी के इन शब्दों का सुदिव्य सोनू पर गहरा असर पड़ा. इसके बाद उन्होंने राजनीति को महज करियर के तौर पर नहीं, बल्कि झारखंड और अपनी माटी के हक-अधिकार की लड़ाई के तौर पर देखा.
राजनीति में आने पर परिवार से भी मिला विरोध
राजनीति में सक्रिय होने का फैसला सुदिव्य सोनू के लिए आसान नहीं था. मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले सुदिव्य के पिता चाहते थे कि उनका बेटा सुरक्षित करियर बनाए और सरकारी या किसी स्थायी नौकरी में अपना भविष्य सुरक्षित करे. परिवार को लगता था कि राजनीति का रास्ता अनिश्चित है और इसमें सुदिव्य अपना भविष्य जोखिम में डाल रहे हैं. ऐसे माहौल में भी सुदिव्य सोनू राजनीति और संगठन के साथ जुड़े रहे.
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जब सुदिव्य के घर पहुंचे थे शिबू सोरेन
सुदिव्य सोनू के राजनीतिक जीवन से जुड़ी एक घटना अक्सर याद की जाती है. बताया जाता है कि साल 2004-05 के दौरान शिबू सोरेन खुद सुदिव्य सोनू के गिरिडीह स्थित घर पहुंचे थे. उस समय सुदिव्य के पिता भी घर पर मौजूद थे. कहा जाता है कि गुरु जी ने सुदिव्य के पिता को देखा और आगे बढ़कर उनके पैर छुए. इसके बाद उनका हाथ थामकर कहा. “आपका बेटा ले जा रहे हैं. कुछ बनाकर देंगे.” गुरु जी के ये शब्द सुदिव्य के पिता के लिए महज आश्वासन नहीं थे. यह उस भरोसे का संदेश था कि उनका बेटा जिस रास्ते पर निकला है, उस सफर में उसे अकेला नहीं छोड़ा जाएगा. सुदिव्य सोनू खुद इस घटना का जिक्र करते हुए बताते थे कि गुरु जी ने उस समय परिवार के भीतर चल रहे तनाव को समझ लिया था. इसके बाद उनके पिता ने फिर कभी उनके राजनीति में रहने को लेकर सवाल नहीं उठाया.
कार्यकर्ता से विधायक और फिर मंत्री तक का सफर
एक सामान्य परिवार से निकले सुदिव्य सोनू ने राजनीति में लंबा संघर्ष किया. संगठन के लिए काम करते हुए उन्होंने अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और आगे चलकर गिरिडीह से विधायक बने. इसके बाद उन्हें झारखंड सरकार में मंत्री की जिम्मेदारी भी मिली. उनका यह सफर सिर्फ एक विधायक या मंत्री बनने की कहानी नहीं था. यह उस कार्यकर्ता की कहानी थी, जिसने अपनी माटी के लिए संघर्ष किया, राजनीतिक जीवन में मुश्किलों का सामना किया और शिबू सोरेन के भरोसे को अपनी ताकत बनाया.
सुदिव्य सोनू की विरासत
सुदिव्य कुमार सोनू के निधन की खबर ने झारखंड की राजनीति को स्तब्ध कर दिया है. उनके जाने के साथ एक ऐसा राजनीतिक सफर भी थम गया, जिसकी शुरुआत सत्ता से नहीं, बल्कि आंदोलन और संगठन के एक सामान्य कार्यकर्ता के तौर पर हुई थी. उनकी कहानी में संघर्ष है, परिवार की चिंता है, गुरु-शिष्य का रिश्ता है और अपनी माटी के लिए कुछ करने का जुनून भी है. एक ऐसा युवा, जिसे अलग राज्य के आंदोलन को लेकर ताने सुनने पड़े. जिसने परिवार के विरोध के बावजूद राजनीति का रास्ता चुना. जिसे शिबू सोरेन ने भरोसा दिया और जिसने आगे चलकर विधायक और मंत्री के रूप में अपनी पहचान बनाई. सुदिव्य सोनू की यही संघर्ष और समर्पण की कहानी झारखंड की राजनीतिक स्मृतियों में लंबे समय तक दर्ज रहेगी.
