रांची : भारत ने 2030 तक अपने जंगलों के जरिए 2.5 से 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन सिंक बनाने का लक्ष्य तय किया है. लेकिन एक बड़ा सवाल यह है कि जिन समुदायों ने सदियों से इन जंगलों की रक्षा की है, अगर उनके अधिकार ही कमजोर पड़ जाएं तो क्या यह लक्ष्य हासिल किया जा सकेगा ?

यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि हाल के वर्षों में वन संरक्षण, वनाधिकार और जलवायु परिवर्तन से जुड़े कानूनों तथा नीतियों में हुए बदलावों को लेकर लगातार बहस तेज हुई है. विशेषज्ञों का मानना है कि भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और आदिवासी समुदायों के वनाधिकार एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं.
नियामगिरि की वह लड़ाई,जिसने दुनिया का ध्यान खींचा
साल 2013 में ओडिशा की नियामगिरि पहाड़ियों में रहने वाले डोंगरिया कोंध समुदाय ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसकी चर्चा पूरी दुनिया में हुई.
इससे पहले अप्रैल 2013 में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने एक ऐतिहासिक फैसले में कहा था कि नियामगिरि क्षेत्र में खनन की अनुमति देने या न देने का अंतिम निर्णय वहां की ग्राम सभाएं लेंगी.
इसके बाद जुलाई और अगस्त 2013 के बीच नियामगिरि क्षेत्र के सभी 12 गांवों में ग्राम सभाएं हुईं. प्रत्येक गांव ने सर्वसम्मति से अपने पवित्र पर्वत पर खनन का विरोध किया और प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया.
यह प्रस्ताव बहुराष्ट्रीय खनन कंपनी वेदांता रिसोर्सेज की ओर से लाया गया था, जो वहां बॉक्साइट खनन करना चाहती थी.
सर्वोच्च न्यायालय ने ग्राम सभाओं के इन निर्णयों को बरकरार रखा और अंततः नियामगिरि में प्रस्तावित खनन परियोजना आगे नहीं बढ़ सकी.
उस समय नियामगिरि सुरक्षा समिति के अध्यक्ष कुमुटी माझी ने कहा था,
” सभी आदिवासी जेल जाने के लिए तैयार हैं, लेकिन हम सरकार के दबाव के सामने नहीं झुकेंगे. “
यह केवल एक खनन परियोजना का विरोध नहीं था, बल्कि जंगल, जैव विविधता और स्थानीय समुदायों के अधिकारों की रक्षा का प्रतीक बन गया.
भारत के जलवायु लक्ष्य में जंगलों की क्या भूमिका है ?
भारत ने संयुक्त राष्ट्र के समक्ष अपनी संशोधित नेशनल डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशन (NDC) के तहत वर्ष 2030 तक 2.5 से 3 अरब टन अतिरिक्त कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य (CO₂e) कार्बन सिंक विकसित करने का लक्ष्य रखा है.
कार्बन सिंक वे प्राकृतिक संसाधन होते हैं, जो वातावरण से कार्बन डाइऑक्साइड को अवशोषित करते हैं. इनमें जंगल सबसे महत्वपूर्ण माने जाते हैं.
दिसंबर 2024 में संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन फ्रेमवर्क कन्वेंशन (UNFCCC) को सौंपी गई भारत की द्विवार्षिक जलवायु रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2020 में देश के वन और भूमि उपयोग क्षेत्र ने भारत के कुल कार्बन उत्सर्जन का लगभग 22 प्रतिशत अवशोषित किया.
यानी भारत के जलवायु लक्ष्यों को पूरा करने में जंगल सबसे बड़ी प्राकृतिक भूमिका निभा रहे हैं.
इन जंगलों की रक्षा कौन करता है ?
सरकारी दस्तावेजों और विभिन्न अध्ययनों के अनुसार, भारत में लगभग 27.5 करोड़ ग्रामीण लोग अपनी आजीविका के लिए जंगलों पर निर्भर हैं.
इनमें करीब 8.9 करोड़ आदिवासी शामिल हैं, जो पीढ़ियों से जंगलों में रहते आए हैं और उनका संरक्षण करते रहे हैं.
विशेषज्ञों का कहना है कि जंगलों की निगरानी, आग पर नियंत्रण, अवैध कटाई रोकना, जल स्रोतों का संरक्षण और जैव विविधता को बचाने में स्थानीय समुदायों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है.
यही कारण है कि जलवायु परिवर्तन पर काम करने वाले कई अंतरराष्ट्रीय अध्ययन समुदाय आधारित वन प्रबंधन को सबसे प्रभावी मॉडल मानते हैं.
वनाधिकार कानून क्या है ?
इसी सोच के आधार पर वर्ष 2006 में अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वन निवासी (वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम, जिसे आमतौर पर वनाधिकार कानून (FRA) कहा जाता है, लागू किया गया.
इस कानून का उद्देश्य उन ऐतिहासिक अन्यायों को दूर करना था, जिनके कारण दशकों तक आदिवासी समुदाय अपने पारंपरिक अधिकारों से वंचित रहे.
कानून के तहत दो प्रमुख प्रावधान किए गए—
- वन भूमि पर व्यक्तिगत और सामुदायिक अधिकारों की मान्यता.
- ग्राम सभाओं को सामुदायिक वन संसाधनों के संरक्षण, प्रबंधन और उपयोग का अधिकार.
सैद्धांतिक रूप से यह कानून आदिवासी समुदायों को देश के बड़े वन क्षेत्रों का कानूनी संरक्षक बनाता है.
लेकिन जमीनी तस्वीर क्या कहती है ?
राइट्स एंड रिसोर्सेज इनिशिएटिव की रिपोर्ट के अनुसार,
- भारत के लगभग 1.70 लाख गांव सामुदायिक वन संसाधन अधिकार पाने के पात्र हैं.
- इन गांवों से जुड़ा लगभग 4 करोड़ हेक्टेयर वन क्षेत्र सामुदायिक अधिकारों के दायरे में आ सकता है.
- लेकिन अब तक केवल लगभग 4.8 लाख हेक्टेयर, यानी करीब 1.2 प्रतिशत क्षेत्र को ही आधिकारिक मान्यता मिल सकी है.
कानून और वास्तविकता
| कानून का उद्देश्य | वर्तमान स्थिति |
|---|---|
| 4 करोड़ हेक्टेयर पर सामुदायिक वन अधिकार | लगभग 4.8 लाख हेक्टेयर पर ही मान्यता |
| 1.70 लाख गांव पात्र | अधिकांश गांवों को अब तक अधिकार पत्र नहीं मिले |
| ग्राम सभा को वन प्रबंधन का अधिकार | कई राज्यों में इसका सीमित क्रियान्वयन |
| वन भूमि हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की सहमति | 2023 के संशोधन के बाद अनिवार्यता समाप्त |
विशेषज्ञों के अनुसार, इसकी प्रमुख वजहें वन और राजस्व विभागों के बीच समन्वय की कमी, प्रशासनिक प्रक्रियाओं में देरी, राज्यों की अलग-अलग कार्यप्रणाली तथा स्थानीय समुदायों को निर्णय प्रक्रिया में पर्याप्त महत्व न मिलना है.
2023 में क्या बदला ?
साल 2023 में संसद ने वन (संरक्षण) संशोधन अधिनियम पारित किया.
इस संशोधन के बाद वन भूमि हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की अनिवार्य सहमति को लेकर पहले जैसी व्यवस्था नहीं रही.आलोचकों का कहना है कि इससे स्थानीय समुदायों की निर्णय प्रक्रिया में भागीदारी कमजोर हो सकती है.
दूसरी ओर सरकार का तर्क है कि संशोधन का उद्देश्य विकास परियोजनाओं की प्रक्रिया को सरल बनाना और विभिन्न प्रशासनिक बाधाओं को कम करना है
वैज्ञानिक शोध क्या कहते हैं ?
संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी जलवायु परिवर्तन पैनल (IPCC) की छठी आकलन रिपोर्ट में कहा गया है कि जिन क्षेत्रों में स्थानीय समुदायों और आदिवासी समूहों की भागीदारी के साथ वन प्रबंधन किया जाता है, वहां—
- वनों की कटाई अपेक्षाकृत कम होती है.
- जैव विविधता बेहतर संरक्षित रहती है.
- कार्बन अवशोषण की क्षमता अधिक होती है.
- प्राकृतिक संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण बेहतर तरीके से संभव होता है.
इसी आधार पर कई पर्यावरण विशेषज्ञ सामुदायिक वन प्रबंधन को जलवायु परिवर्तन से निपटने की प्रभावी रणनीति मानते हैं.
सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा ?
मार्च 2024 में सर्वोच्च न्यायालय ने एम.के. रंजीतसिंह एवं अन्य बनाम भारत संघ मामले में एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया. अदालत ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार में जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से सुरक्षा भी शामिल है.
इस फैसले को जलवायु न्याय के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण संवैधानिक कदम माना गया. विशेषज्ञों का कहना है कि यदि जलवायु सुरक्षा को मौलिक अधिकार का हिस्सा माना जाता है, तो जंगलों और उन्हें संरक्षित रखने वाले समुदायों की भूमिका भी पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है.
सरकार की नई पहल
केंद्र सरकार ने वर्ष 2024 में प्रधानमंत्री जनजातीय उन्नत ग्राम अभियान शुरू किया. इसका उद्देश्य वनाधिकारों की मान्यता की प्रक्रिया को तेज करना और जनजातीय क्षेत्रों में विकास योजनाओं को प्रभावी ढंग से लागू करना है.
हालांकि कई विशेषज्ञों का मानना है कि यदि इस अभियान को भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं और कार्बन सिंक लक्ष्यों से स्पष्ट रूप से नहीं जोड़ा गया, तो इसका प्रभाव सीमित रह सकता है.
विशेषज्ञ किन बदलावों की जरूरत बताते हैं ?
वनाधिकार और जलवायु नीति पर काम करने वाले विशेषज्ञ तीन प्रमुख सुझाव देते हैं—
- सामुदायिक वन संसाधन अधिकारों की मान्यता के लिए स्पष्ट और समयबद्ध राष्ट्रीय लक्ष्य तय किए जाएं.
- पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में वन भूमि हस्तांतरण से पहले ग्राम सभा की प्रभावी भागीदारी सुनिश्चित की जाए.
- आदिवासी समुदायों के पारंपरिक पारिस्थितिक ज्ञान को जलवायु अनुकूलन और आपदा प्रबंधन योजनाओं का हिस्सा बनाया जाए.
आगे की चुनौती
भारत लगातार खुद को वैश्विक स्तर पर जलवायु नेतृत्वकर्ता के रूप में प्रस्तुत कर रहा है. लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि केवल अंतरराष्ट्रीय मंचों पर घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी.
यदि भारत को अपने कार्बन सिंक लक्ष्य हासिल करने हैं, तो जंगलों की रक्षा करने वाले समुदायों को कानूनी अधिकार, संस्थागत सहयोग और निर्णय प्रक्रिया में वास्तविक भागीदारी देना भी उतना ही आवश्यक होगा.
नियामगिरि में डोंगरिया कोंध समुदाय ने अपने सामूहिक फैसले से एक पर्वतीय क्षेत्र को खनन से बचाया था. अब यह बहस केवल एक क्षेत्र तक सीमित नहीं है. सवाल यह है कि क्या देश के लाखों आदिवासी समुदायों के पास भविष्य में भी अपने जंगलों की रक्षा के लिए वैसी ही प्रभावी कानूनी शक्ति होगी, जिस पर भारत की जलवायु प्रतिबद्धताओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा निर्भर करता है.
