Ritika
RANCHI : हजारीबाग में घटी हृदयविदारक घटना के खिलाफ लगभग हर किसी ने अपनी आवाज बुलंद की. लेकिन हर मुद्दे ओर मुखर रहने वाले इरफान अंसारी इस मुद्दे पर बिल्कुल खामोश रहे. साथ ही इस मामले के उद्भेदन से पहले बाबूलाल मरांडी काफी सक्रिय थे लेकिन जैसे ही मामले का खुलासा हुआ और राजनीतिक एंगल सामने आया बाबूलाल मरांडी भी बिल्कुल खामोश हो गए. इसके अलावा मामले के उद्भेदन के बाद हो रही सेलेक्टिव राजनीति को लेकर भी बहस छिड़ गई है.
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इरफान अंसारी की खामोशी
चलिये पहले शुरुआत करते हैं कांग्रेस के इरफान अंसारी से. इरफान अंसारी जी, आप झारखंड के मंत्री हैं, कांग्रेस के बड़े नेता हैं, और राज्य की राजनीति में खुद को एक बड़ा चेहरा मानते हैं. लेकिन हजारीबाग के विष्णुगढ़ में एक मासूम बच्ची की हत्या के मामले में आपने इतनी लंबी चुप्पी आखिर क्यों साध रखी थी? पूरा राज्य इस घटना से आक्रोश में था, लोग सड़कों पर थे, हर तरफ सवाल उठ रहे थे, लेकिन आप खामोश थे. न आपके सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट दिखी, न आपने किसी मंच से कोई कड़ा बयान दिया, न पीड़ित परिवार के लिए खुलकर आवाज उठाई. आखिर क्यों? क्या इसलिए कि वह बच्ची किसी विशेष समुदाय से नहीं थी? क्या इसलिए कि इस घटना में आपको उस समय कोई राजनीतिक फायदा दिखाई नहीं दे रहा था?
चुप रहने वाले लोग अचानक सड़कों पर
सवाल सिर्फ आपसे ही नहीं है, सवाल उन तमाम राजनीतिक दलों से भी है जो खुद को जनता का सबसे बड़ा हितैषी बताते हैं. कांग्रेस हो या झामुमो, पूरे एक सप्ताह तक इन पार्टियों की चुप्पी क्यों बनी रही? इतने दिनों तक न कोई सड़क पर उतरा, न किसी बड़े नेता ने न्याय की मांग को लेकर आंदोलन किया, न किसी ने इस मासूम बच्ची के लिए आवाज बुलंद की. आखिर यह चुप्पी किस बात की थी? क्या तब तक सब लोग यह इंतजार कर रहे थे कि आरोपी किस पार्टी से जुड़ा हुआ है? लेकिन जैसे ही पुलिस की जांच में यह सामने आया कि इस मामले में एक आरोपी का संबंध भाजपा से जुड़ा हुआ है, अचानक राजनीति का पूरा रंग बदल गया. जो लोग एक सप्ताह तक चुप थे, वे अचानक सड़कों पर दिखाई देने लगे. अचानक फांसी की मांग होने लगी, अचानक बयानबाजी शुरू हो गई, अचानक आंदोलन तेज हो गया. सवाल यही है कि अगर न्याय की लड़ाई सच में थी तो यह आवाज पहले क्यों नहीं उठी? क्या एक मासूम बच्ची की जिंदगी की कीमत भी अब इस बात से तय होगी कि आरोपी किस पार्टी का है? हम भी चाहते हैं कि जिसने भी यह जघन्य अपराध किया है उसे कड़ी से कड़ी सजा मिले, उसे ऐसी सजा मिले जो पूरे समाज के लिए एक उदाहरण बने.
सेलेक्टिव राजनीति
लेकिन इस घटना ने राजनीतिक दलों की दोहरी मानसिकता को भी पूरी तरह उजागर कर दिया है. जब आरोपी अपने खेमे का निकलता है तो नेता चुप्पी साध लेते हैं, और जब आरोपी विरोधी दल से जुड़ा हुआ दिखाई देता है तो वही नेता अचानक न्याय के सबसे बड़े योद्धा बन जाते हैं. यही सवाल अब झारखंड की राजनीति से पूछा जा रहा है कि आखिर एक मासूम बच्ची की मौत पर भी इतनी गंदी राजनीति क्यों? अगर न्याय की मांग सच्ची थी तो फिर एक सप्ताह तक ये पार्टियां सड़कों पर क्यों नहीं थीं? तब कोई पोस्ट क्यों नहीं डाली गई, तब फांसी की मांग क्यों नहीं उठाई गई? और सवाल सिर्फ कांग्रेस या जेएमएम से ही नहीं है, सवाल झारखंड बीजेपी से भी है. इतने दिनों तक भाजपा नेताओं ने इस मुद्दे पर जोरदार हल्ला बोला, प्रेस कॉन्फ्रेंस कीं, नारेबाजी की, सड़कों पर आंदोलन किए, झारखंड बंद तक का ऐलान कर दिया. लेकिन जैसे ही देर रात पुलिस ने आरोपी के बारे में जानकारी दी और यह सामने आया कि मुख्य आरोपी का संबंध भाजपा से भी जुड़ा हुआ है, अचानक वही आवाजें शांत हो गईं. जो नेता हर दिन बयान दे रहे थे, जो फांसी की मांग कर रहे थे, जो सड़कों पर आंदोलन कर रहे थे, वे अचानक चुप क्यों हो गए?
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खुलासे के बाद बाबूलाल की चुप्पी
झारखंड बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष बाबूलाल मरांडी भी अब इस मामले में खामोश दिखाई दे रहे हैं. कल तक जो लगातार बयान दे रहे थे, आज उनके सोशल मीडिया पर भी इस घटना को लेकर कोई कड़ी प्रतिक्रिया दिखाई नहीं दे रही. इसलिए सवाल अब और भी तेज हो गया है कि क्या एक मासूम बच्ची की मौत भी सिर्फ राजनीतिक रोटी सेंकने का जरिया बन गई है? क्या न्याय की आवाज भी अब इस बात पर निर्भर करेगी कि आरोपी किस पार्टी का है, किस समुदाय से आता है? सच तो यह है कि इस पूरे कांड ने झारखंड की राजनीति का असली चेहरा सामने ला दिया है. यहां इंसाफ की बात तब तक होती है जब तक उससे राजनीतिक फायदा मिलता है. जिस दिन सच सामने आता है, उसी दिन नेताओं की आवाज बदल जाती है और आंदोलन की आग ठंडी पड़ जाती है. एक मासूम बच्ची की जिंदगी चली गई, एक परिवार बर्बाद हो गया, लेकिन राजनीतिक दलों के लिए यह सिर्फ एक मुद्दा बनकर रह गया. आज हालत यह है कि इंसानियत से ज्यादा धर्म, जाति और पार्टी की पहचान मायने रखने लगी है.
