Vaibhav Pandey
RANCHI : 10 जून 2022 को झारखंड की राजधानी रांची का मेन रोड अचानक हिंसा की आग में जल उठा था. शहर का सबसे व्यस्त इलाका अल्बर्ट एक्का चौक से सुजाता चौक तक कुछ ही घंटों में पत्थरबाजी, अफरातफरी और गोलीबारी का मैदान बन गया. उस दिन दो लोगों की मौत हुई थी, कई घायल हुए, दुकानों के शटर गिर गए, और पूरा शहर कर्फ्यू की गिरफ्त में चला गया. इंटरनेट बंद हुआ, पुलिस और प्रशासन अलर्ट पर आ गए, और पूरे देश की निगाहें रांची पर टिक गईं. लेकिन चार साल बाद जब इस घटना से जुड़े मुख्य मामले डेली मार्केट थाना कांड संख्या 16/22 पर अदालत का फैसला आया, तो कहानी ने एक अप्रत्याशित मोड़ ले लिया.
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रांची सिविल कोर्ट में मान्या टंडन की अदालत ने इस मामले में सभी आरोपियों को दोषमुक्त (बरी) कर दिया. फैसले के बाद एक बड़ा सवाल हवा में तैरता रह गया की अगर ये लोग दोषी नहीं थे, तो 10 जून 2022 को रांची की सड़कों पर हिंसा किसने की थी.

उस दिन क्या हुआ था
10 जून 2022 को जुमे की नमाज़ के बाद रांची के कई इलाकों से लोग विरोध प्रदर्शन के लिए निकले थे. विरोध की पृष्ठभूमि में देशभर में चल रहा विवाद था, जिसमें भाजपा की तत्कालीन प्रवक्ता नूपुर शर्मा के बयान को लेकर नाराज़गी जताई जा रही थी. रांची में भी शुरुआत में विरोध प्रदर्शन शांतिपूर्ण बताया गया. लेकिन कुछ ही देर में भीड़ मेन रोड की तरफ बढ़ने लगी. मेन रोड, जो रांची का सबसे संवेदनशील और व्यस्त इलाका माना जाता है, वहां पहले से ही पुलिस तैनात थी. लेकिन भीड़ का आकार अचानक बढ़ गया.
इसके बाद हालात तेजी से बिगड़ने लगे, बैरिकेड तोड़े गए, पत्थरबाजी शुरू हुई, पुलिस पर हमला हुआ, अफरातफरी मच गई. स्थिति नियंत्रण से बाहर होती देख पुलिस ने पहले लाठीचार्ज और फिर आंसू गैस का इस्तेमाल किया. जब हालात और बिगड़े, तो पुलिस फायरिंग की खबरें सामने आईं. उस दिन दो युवकों की मौत हो गई. शहर में कर्फ्यू लगा दिया गया और इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं.

पुलिस ने क्या कहा था
घटना के तुरंत बाद पुलिस ने कई एफआईआर दर्ज कीं, मुख्य मामला डेली मार्केट थाना कांड संख्या 16/22 के रूप में दर्ज हुआ. इसमें कई गंभीर धाराएं लगाई गईं: 120B (साजिश), 147, 148, 149 (दंगा और भीड़ हिंसा), 153A (साम्प्रदायिक वैमनस्य फैलाना), 341, 353 (सरकारी काम में बाधा), 295A और 504. पुलिस ने दावा किया कि हिंसा संगठित तरीके से की गई और कुछ लोगों ने भीड़ को उकसाने में भूमिका निभाई. जांच के दौरान कई लोगों को आरोपी बनाया गया, जिनमें नवाब चिश्ती और अन्य नाम शामिल थे. चार्जशीट दाखिल हुई, केस कोर्ट में चला और सुनवाई शुरू हुई.

चार साल बाद क्या हुआ
करीब चार साल तक चले इस मामले में अदालत ने सभी आरोपियों को बरी कर दिया. अदालत का फैसला कानून के उस सिद्धांत पर आधारित होता है जो कहता है. अपराध तब तक साबित नहीं माना जाएगा जब तक संदेह से परे प्रमाण न हो. अगर अभियोजन पक्ष अदालत को यह साबित नहीं कर पाता कि आरोपी ने ही अपराध किया, तो अदालत आरोपी को दोषमुक्त कर सकती है. लेकिन यही वह बिंदु है जहां सवाल खड़े होने लगते हैं.
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सवाल नंबर 1, पुलिस की जांच में क्या कमी थी
जब इतनी बड़ी घटना हुई, जिसमें दो लोगों की मौत हुई, हजारों की भीड़ शामिल थी, राजधानी का मुख्य इलाका प्रभावित हुआ तो जांच के दौरान ठोस सबूत क्यों नहीं जुट पाए? क्या सीसीटीवी फुटेज पर्याप्त नहीं थे? क्या पुलिस के पास घटनास्थल के वीडियो नहीं थे? क्या डिजिटल फॉरेंसिक का इस्तेमाल नहीं हुआ?अगर हुआ, तो अदालत में वे सबूत क्यों नहीं टिक पाए?

सवाल नंबर 2, क्या गवाह मुकर गए
दंगा और भीड़ हिंसा के मामलों में अक्सर एक बड़ी समस्या सामने आती है गवाहों का मुकर जाना. कई मामलों में गवाह अदालत में पहचान करने से इनकार कर देते हैं या कहते हैं कि उन्होंने आरोपी को देखा ही नहीं ऐसी स्थिति में अभियोजन का मामला कमजोर हो जाता है. अगर इस केस में भी ऐसा हुआ, तो यह सवाल उठता है क्या गवाहों को सुरक्षा दी गई थी?

सवाल नंबर 3, क्या गलत लोगों को आरोपी बनाया गया
कभी-कभी पुलिस पर यह दबाव होता है कि बड़ी घटना के बाद जल्द से जल्द गिरफ्तारी दिखाई जाए, ऐसे में कई बार भीड़ में मौजूद लोगों को ही आरोपी बना दिया जाता है. लेकिन वे असली हमलावर नहीं होते हैं. अगर ऐसा हुआ, तो यह जांच की गंभीर विफलता मानी जाएगी.

सवाल नंबर 4, असली दोषी था कौन
सबसे बड़ा सवाल यही है. अगर अदालत ने कहा कि आरोपियों के खिलाफ पर्याप्त सबूत नहीं हैं, तो इसका मतलब यह नहीं कि घटना हुई ही नहीं. घटना हुई थी. लोग घायल हुए थे. दो युवकों की मौत हुई थी. शहर में कर्फ्यू लगा था. फिर यह सब किसने किया? क्या असली दोषी आज भी पहचान से बाहर हैं?
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भीड़ हिंसा और न्याय व्यवस्था
भारत में दंगा मामलों का इतिहास बताता है कि ऐसे मामलों में सजा दर बहुत कम होती है. इसके पीछे कई कारण होते हैं..
- भीड़ में अपराधी की पहचान मुश्किल होती है
- सबूत इकट्ठा करना कठिन होता है
- गवाह डर जाते है
- केस सालों तक चलता है
और अंत में अदालत कहती है, संदेह का लाभ आरोपी को दिया जाता है.
क्या जांच एजेंसियों की जवाबदेही तय होगी? अब एक और सवाल उठता है कि अगर चार साल की जांच के बाद अदालत में आरोप साबित नहीं हो पाए, तो क्या जांच एजेंसियों की जिम्मेदारी तय होगी? क्या यह देखा जाएगा कि जांच में कहां कमी रह गई? क्या भविष्य में ऐसी घटनाओं के लिए बेहतर जांच प्रणाली बनाई जाएगी?

न्याय और सच्चाई के बीच की दूरी
कानून का सिद्धांत स्पष्ट है कि सिर्फ शक के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. इसलिए अदालत का फैसला कानूनी रूप से सही हो सकता है. लेकिन समाज के स्तर पर एक खालीपन रह जाता है.
क्योंकि सवाल अब भी वही है कि 10 जून 2022 को रांची की सड़कों पर हिंसा किसने की थी?
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अब आगे क्या होना है
अब इस मामले के बाद दो चीजें जरूरी हो जाती हैं- पहली, जांच प्रक्रिया की समीक्षा होगी और दूसरी, भविष्य में ऐसी घटनाओं को रोकने के लिए बेहतर तैयारी. क्योंकि जब किसी बड़ी घटना का अंत इस तरह होता है कि न कोई दोषी, न कोई जिम्मेदार, तो लोगों का भरोसा व्यवस्था पर कमजोर पड़ता है. अंत में बस यही कहा जा सकता है कि रांची मेन रोड की वह घटना सिर्फ एक दंगा नहीं थी, वह एक ऐसा दिन था जब राजधानी की सड़कों पर कानून व्यवस्था को गंभीर चुनौती मिली. चार साल बाद अदालत का फैसला आ गया, आरोपी बरी हो गए. लेकिन शहर के लोगों के मन में एक सवाल अब भी बाकी है, अगर वे दोषी नहीं थे, तो उस दिन का जिम्मेदार कौन था? और शायद यही सवाल इस पूरे मामले की सबसे बड़ी कहानी है.
