RANCHI : झारखंड को अक्सर “जल, जंगल और जमीन” की संवेदनशील भूमि कहा जाता है. यह वह राज्य है जहां लोकतंत्र की असली ताकत गांवों, आदिवासियों और आम लोगों से आती है. लेकिन हाल के कुछ घटनाक्रम ऐसे सामने आए हैं जो यह सवाल खड़ा कर रहे हैं कि क्या प्रशासन जनता की सेवा के लिए है या जनता पर अपना रौब दिखाने के लिए?
हाल ही में तीन अलग-अलग घटनाओं ने पूरे राज्य में प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं. कहीं सीओ साहिबा आम लोगों पर लाठी चला रही हैं, कहीं डीसी साहब जल सहिया पर सार्वजनिक रूप से चिल्ला रहे हैं, और कहीं मंदिर परिसर में पुलिसकर्मी एक श्रद्धालु को उसकी पत्नी और बच्चों के सामने घेरकर पीट रहे हैं. यह सिर्फ तीन घटनाएं नहीं हैं, बल्कि प्रशासनिक सोच की एक खतरनाक प्रवृत्ति की झलक हैं.
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अहंकार या प्रशासनिक मजबूरी
सरकारी पद का मतलब होता है जिम्मेदारी और संयम. एक सीओ (अंचल अधिकारी) का पद राजस्व और भूमि से जुड़े मामलों को संवेदनशीलता से संभालने के लिए होता है. लेकिन जब वही अधिकारी जनता पर लाठी चलाते नजर आते हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या संवाद की जगह बल प्रयोग प्रशासन का नया तरीका बन गया है?

इसी तरह, जल सहिया-जो गांवों में पानी और स्वच्छता से जुड़ी सेवाओं को संभालने वाली महिलाएं होती हैं — वे पहले से ही सीमित संसाधनों में काम करती हैं. अगर किसी डीसी द्वारा उनके साथ सार्वजनिक रूप से अपमानजनक व्यवहार किया जाता है, तो यह न केवल उस महिला का अपमान है बल्कि पूरे सिस्टम की असंवेदनशीलता को दिखाता है.
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मंदिर में हिंसा : कानून का राज या भय का माहौल
सबसे चिंताजनक घटना मंदिर परिसर की है, जहां पुलिसकर्मी एक व्यक्ति को उसकी पत्नी और बच्चों के सामने घेरकर पीटते दिखे. मंदिर जैसे धार्मिक स्थल में इस तरह की घटना केवल कानून व्यवस्था का सवाल नहीं है, बल्कि सामाजिक और नैतिक संवेदनशीलता का भी मुद्दा है. पुलिस का काम कानून लागू करना है, लेकिन कानून के नाम पर अपमान और हिंसा का प्रदर्शन करना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है. अगर कोई व्यक्ति दोषी है, तो उसके खिलाफ कानूनी प्रक्रिया मौजूद है. लेकिन परिवार के सामने उसे पीटना न तो न्याय है और न ही कानून.
लोकतंत्र में प्रशासन की भूमिका
भारत का संविधान प्रशासन को शक्ति देता है, लेकिन साथ ही उस शक्ति पर नैतिक और कानूनी सीमाएं भी तय करता है. प्रशासन का असली उद्देश्य जनता की सेवा करना है, न कि जनता को डराना. झारखंड जैसे सामाजिक रूप से संवेदनशील राज्य में प्रशासन का रवैया और भी ज्यादा जिम्मेदार होना चाहिए। यहां आदिवासी, ग्रामीण और गरीब तबके की बड़ी आबादी है, जो पहले ही व्यवस्था से दूरी महसूस करती है। अगर प्रशासन का चेहरा कठोर और अपमानजनक बनता है, तो यह दूरी और गहरी हो जाएगी.
झारखंड में हाल की घटनाएं एक गंभीर चेतावनी हैं. अगर प्रशासन का रवैया जनता के प्रति सम्मानजनक और संवेदनशील नहीं रहेगा, तो लोकतंत्र का आधार कमजोर होगा. लाठी, चीख और डर से व्यवस्था कुछ समय के लिए चल सकती है, लेकिन भरोसे और सम्मान के बिना कोई भी शासन लंबे समय तक टिक नहीं सकता. झारखंड को ऐसे प्रशासन की जरूरत है जो जनता को दुश्मन नहीं, बल्कि अपने दायित्व का केंद्र समझे. क्योंकि लोकतंत्र में असली मालिक जनता ही होती है.
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