झारखंड/लातेहार : खेती केवल रोज़गार नहीं, बल्कि करोड़ों किसानों के लिए जीवन का आधार है. जब संसाधन साथ छोड़ देते हैं, तब भी किसान उम्मीद का दामन नहीं छोड़ता. झारखंड के लातेहार जिले से ऐसी ही एक तस्वीर सामने आई है, जो खेती-किसानी की कठिन सच्चाई और एक किसान के अटूट साहस को बयां करती है.

लातेहार जिले के हेरहंज प्रखंड के आरा-हारा गांव के किसान रवींद्र मिस्त्री इन दिनों चर्चा में हैं. वजह यह नहीं कि उन्होंने कोई नई कृषि तकनीक अपनाई है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने संसाधनों के अभाव में अपनी मोटरसाइकिल को ही खेत जोतने का साधन बना लिया. उनका यह प्रयास मजबूरी का परिणाम जरूर है, लेकिन इसमें संघर्ष, आत्मविश्वास और उम्मीद की झलक भी साफ दिखाई देती है.
इसे भी पढे : हजारीबाग में ऑपरेशन के बाद महिला की मौत, नर्सिंग होम पर लापरवाही का आरोप
खेती का मौसम, लेकिन साधन नहीं
इन दिनों झारखंड में खरीफ फसलों की बुआई का समय चल रहा है. अधिकांश किसान धान, मकई और अन्य फसलों की खेती की तैयारी में जुटे हैं. ऐसे समय में खेत तैयार करने के लिए ट्रैक्टर, हल या बैलों की आवश्यकता होती है.
लेकिन रवींद्र मिस्त्री के पास इनमें से कोई भी साधन उपलब्ध नहीं है. उनकी आर्थिक स्थिति इतनी मजबूत नहीं कि वे ट्रैक्टर किराये पर ले सकें. बैलों की जोड़ी भी नहीं है और पारंपरिक हल से खेती करना भी संभव नहीं हो पा रहा था.
इसी बीच इस वर्ष सामान्य से कम बारिश होने के कारण क्षेत्र के कई खेत अब भी पर्याप्त नमी का इंतजार कर रहे हैं. बारिश की कमी ने किसानों की चिंता और बढ़ा दी है. ऐसे हालात में खेती टालना उनके लिए विकल्प नहीं था, क्योंकि पूरे परिवार की आजीविका इसी पर निर्भर है.
जब मोटरसाइकिल बनी ‘देसी ट्रैक्टर’
रवींद्र ने हार मानने के बजाय एक अलग रास्ता चुना. उन्होंने अपनी मोटरसाइकिल का उपयोग खेत तैयार करने के लिए किया और उसी की मदद से मकई की बुआई शुरू कर दी.
न बैल, न ट्रैक्टर… फिर भी नहीं टूटा किसान का हौसला, बाइक को बनाया हल और खेत में बो दी उम्मीद"
किसान की मार्मिक कहानी—संसाधनों की कमी, सूखे की मार और पेट की चिंता के बीच भी हार नहीं मानी
झारखंड,लातेहार: कहते हैं, किसान हारना नहीं जानता। हालात कितने भी कठिन क्यों न हों, वह उम्मीद… pic.twitter.com/QELkkRFMzD
— Sohan singh (@sohansingh05) July 12, 2026
खेत में मोटरसाइकिल के सहारे काम करते हुए उनका वीडियो और तस्वीरें लोगों का ध्यान खींच रही हैं. यह दृश्य केवल एक अनोखे जुगाड़ का उदाहरण नहीं है, बल्कि उन परिस्थितियों का भी प्रतीक है, जिनमें देश का किसान खेती करने के लिए मजबूर होता है.
किसान को अब भी बारिश का इंतजार
रवींद्र मिस्त्री का कहना है कि इस बार बारिश उम्मीद के मुताबिक नहीं हुई है. इसके बावजूद उन्होंने खेती का काम रोकने के बजाय उपलब्ध संसाधनों से ही शुरुआत कर दी.
उनके शब्दों में,
“बारिश कम हुई है, फिर भी उम्मीद है कि फसल अच्छी होगी. ट्रैक्टर और बैल नहीं थे, इसलिए मजबूरी में बाइक से ही खेत तैयार कर रहा हूं. मेहनत ही हमारा सहारा है.”
उनकी यह बात बताती है कि कठिन परिस्थितियों के बीच भी किसान अपनी मेहनत और मौसम की मेहरबानी पर भरोसा बनाए रखता है.
एक किसान नहीं, हजारों परिवारों की कहानी
रवींद्र मिस्त्री की कहानी केवल एक व्यक्ति की नहीं है. यह उन हजारों किसानों की वास्तविकता को सामने लाती है, जो हर वर्ष संसाधनों की कमी, बढ़ती लागत, मौसम की अनिश्चितता और आर्थिक तंगी जैसी चुनौतियों का सामना करते हैं.
कई छोटे और सीमांत किसान आज भी खेती के लिए किराये के ट्रैक्टर, उधार के साधनों या स्थानीय जुगाड़ पर निर्भर रहते हैं. समय पर खेत तैयार नहीं होने पर पूरी फसल प्रभावित हो सकती है, इसलिए वे किसी भी तरह खेती का काम जारी रखने की कोशिश करते हैं.
संघर्ष के बीच उम्मीद की खेती
देश की खाद्य सुरक्षा की नींव किसानों की मेहनत पर टिकी है. खेतों में बहाया गया उनका पसीना करोड़ों लोगों की थाली तक अन्न पहुंचाता है. इसके बावजूद अनेक किसान आज भी बुनियादी कृषि संसाधनों के अभाव में खेती करने को मजबूर हैं. लातेहार के इस किसान की तस्वीर केवल एक खेत की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की कहानी है, जिसमें मजबूरी और उम्मीद साथ-साथ चलती हैं. मोटरसाइकिल से जोता गया यह खेत याद दिलाता है कि किसान परिस्थितियों से लड़ सकता है, लेकिन खेती छोड़ना उसके स्वभाव में नहीं है.
