RANCHI : जमीन के कागजात दुरुस्त कराने हों, दाखिल-खारिज कराना हो या किसी सरकारी आदेश की प्रति लेनी हो-आम लोगों को इन कामों के लिए सरकारी दफ्तरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं. लेकिन जब इसी प्रक्रिया में रिश्वत मांगने के आरोप सामने आने लगें, तो सरकारी व्यवस्था की जवाबदेही पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
दरअसल बात ऐसी है की हमारे अंचल कार्यालय अब जनता की सेवा के केंद्र नहीं ,बल्कि खुलेआम रिश्वतखोरी और घुश्खोरो के अड्डे बन चुके हैं. झारखंड में सितंबर से अक्टूबर 2026 के बीच एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) की लगातार कार्रवाइयों ने राजस्व और अंचल कार्यालयों में कथित भ्रष्टाचार के मुद्दे को फिर चर्चा में ला दिया है. दैनिक जागरण समेत विभिन्न अखबारों में प्रकाशित खबरों के अनुसार, करीब एक महीने के भीतर छह अलग-अलग मामलों में 10 आरोपियों की गिरफ्तारी हुई है. इन मामलों में रिश्वत लेने, जमीन के दस्तावेजों से जुड़े कथित अनियमितताओं और सरकारी जमीन के अवैध लेन-देन जैसे आरोप शामिल हैं.

और सबसे जायदा चौंकाने वाली बात तो यह है कि. ये सभी छह के छह मामले जमीन और अंचल कार्यालयों यानी अमीन, कर्मचारी और सीओ दफ्तर से जुड़े हुए हैं.यानी जहाँ गरीब और आम किसान अपनी जमीन के कागजात दुरुस्त कराने जाता है.वहीं रिश्वतखोरी का सबसे बड़ा खेल खेला जा रहा है.
चतरा में 15 हजार रुपये रिश्वत लेते राजस्व कर्मचारी गिरफ्तार
एसीबी की कार्रवाई में 15 सितंबर 2026 को चतरा सदर अंचल क्षेत्र के राजस्व कर्मचारी सतीश कुमार की गिरफ्तारी का मामला सामने आया. आरोप है कि उन्होंने गिद्धौर प्रखंड के नयाखाप निवासी तुलसी यादव से जमीन के दाखिल-खारिज के बदले 35 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी. शिकायत के बाद एसीबी हजारीबाग की टीम ने कार्रवाई की और सतीश कुमार को कथित तौर पर 15 हजार रुपये रिश्वत लेते हुए गिरफ्तार कर लिया.

यह मामला इसलिए अहम है, क्योंकि दाखिल-खारिज जमीन के रिकॉर्ड में स्वामित्व से संबंधित बदलाव दर्ज कराने की एक महत्वपूर्ण प्रशासनिक प्रक्रिया है. इस काम के लिए रिश्वत मांगने का आरोप सीधे तौर पर उस व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है, जिस पर आम लोगों को भरोसा करना पड़ता है.
नामकुम में अंचल निरीक्षक और लिपिक पर कार्रवाई
इसके बाद 22 सितंबर को एसीबी रांची की टीम ने नामकुम अंचल के तत्कालीन अंचल निरीक्षक मनोज कुमार दीक्षित और तत्कालीन लिपिक दीपक कुमार को गिरफ्तार किया. प्रकाशित खबरों के अनुसार, यह मामला दाखिल-खारिज से संबंधित दस्तावेजों के गायब होने के आरोप से जुड़ा है. इस मामले में तत्कालीन अंचल अधिकारी डॉ. श्वेता वर्मा के खिलाफ भी जांच जारी होने की बात सामने आई है.

हालांकि, किसी व्यक्ति के खिलाफ जांच होना अपने आप में अपराध सिद्ध होने के बराबर नहीं है. मामले में संबंधित लोगों की भूमिका और जिम्मेदारी का निर्धारण जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया के आधार पर ही होगा.
हजारीबाग और रामगढ़ में सरकारी जमीन के अवैध कारोबार की जांच
23 सितंबर से 7 अक्टूबर के बीच हजारीबाग और रामगढ़ में वन भूमि तथा गैरमजरुआ सरकारी जमीन की कथित अवैध खरीद-बिक्री से जुड़े मामलों में भी कार्रवाई की खबरें सामने आईं. इन मामलों में भू-माफिया और अमीन-कर्मचारियों के बीच कथित सांठगांठ की पड़ताल की गई. सरकारी जमीन के रिकॉर्ड, उसके हस्तांतरण और संबंधित अधिकारियों-कर्मचारियों की भूमिका को लेकर उठे सवाल इस बात की ओर इशारा करते हैं कि जमीन से जुड़े मामलों में केवल रिश्वत लेने के आरोप ही नहीं, बल्कि रिकॉर्ड की पारदर्शिता और निगरानी भी महत्वपूर्ण मुद्दे हैं.
चतरा में एसडीएम कार्यालय का प्रधान लिपिक गिरफ्तार
एसीबी की कार्रवाई का एक और मामला 8 अक्टूबर को सामने आया, जब एसीबी हजारीबाग की टीम ने चतरा एसडीएम कार्यालय के प्रधान लिपिक बासुदेव राम को गिरफ्तार किया. आरोप है कि उन्होंने शिकायतकर्ता बिलास यादव से जमीन से जुड़े एक मामले में एसडीएम के आदेश की प्रति उपलब्ध कराने के बदले 15 हजार रुपये की रिश्वत ली. इस मामले में भी गिरफ्तारी आरोपों के आधार पर हुई है. अंतिम दोषसिद्धि का फैसला न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही होगा.

आखिर क्या होता है ट्रैप केस?
एसीबी की कार्रवाई में अक्सर ‘ट्रैप केस’ शब्द का इस्तेमाल किया जाता है. इसका मतलब है कि जब किसी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी के खिलाफ रिश्वत मांगने की शिकायत मिलती है, तो जांच एजेंसी शिकायत की जांच करने के बाद नियमानुसार जाल बिछाकर कार्रवाई करती है. ऐसी कार्रवाई में रिश्वत की रकम को सबूत के तौर पर बरामद करने और संबंधित आरोपों की पुष्टि के लिए निर्धारित प्रक्रियाओं का पालन किया जाता है. कई मामलों में आरोपी को रिश्वत लेते हुए पकड़ा जाता है.
हालांकि, गिरफ्तारी के बाद भी जांच, आरोपपत्र और अदालत में सुनवाई की प्रक्रिया पूरी होना जरूरी है. किसी आरोपी को दोषी तभी माना जाता है, जब अदालत में अपराध साबित हो जाए.
कार्रवाई के बाद भी बड़ा सवाल-बिना रिश्वत काम क्यों नहीं?
एसीबी की लगातार कार्रवाइयां भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकायतों पर कार्रवाई की अहमियत दिखाती हैं. लेकिन सवाल केवल गिरफ्तारियों की संख्या का नहीं है. सवाल यह भी है कि जमीन के दाखिल-खारिज, सरकारी दस्तावेजों और आदेशों की प्रतियां हासिल करने जैसी सामान्य प्रक्रियाओं को आम नागरिकों के लिए आसान और पारदर्शी कैसे बनाया जाए.
क्या राजस्व कार्यालयों में आवेदन की स्थिति ऑनलाइन उपलब्ध है? क्या काम पूरा करने की समय-सीमा का पालन हो रहा है? क्या रिश्वत मांगने की शिकायतों पर समय रहते कार्रवाई होती है? और क्या दोषी पाए जाने वाले कर्मचारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई भी सुनिश्चित की जाती है?
इन सवालों के जवाब प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार के लिए जरूरी हैं भ्रष्टाचार के खिलाफ कार्रवाई तभी व्यापक असर दिखाएगी, जब आम नागरिक को अपना वैध काम कराने के लिए रिश्वत देने की मजबूरी न हो. एसीबी की कार्रवाई एक महत्वपूर्ण कदम हो सकती है, लेकिन स्थायी बदलाव के लिए पारदर्शिता, जवाबदेही और समयबद्ध सेवा सुनिश्चित करना भी उतना ही जरूरी है.
