रांची / बोकारो : चास महाविद्यालय में अनुबंध पर काम करने वाली सफाईकर्मी मधुका देवी पिछले करीब पांच महीनों से मानदेय नहीं मिलने की समस्या से जूझ रही हैं. उनका कहना है कि उन्होंने वर्षों से महाविद्यालय में नियमित रूप से साफ-सफाई का काम किया है, लेकिन लंबे समय से मेहनताना नहीं मिलने के कारण परिवार चलाना मुश्किल हो गया है. मधुका देवी के मुताबिक, गर्मी, सर्दी और बारिश जैसी परिस्थितियों के बावजूद उन्होंने अपने काम में कभी लापरवाही नहीं की. रोजाना महाविद्यालय परिसर की सफाई करने वाली मधुका देवी अब उसी परिसर के सामने अपने बकाया मानदेय के भुगतान की मांग कर रही हैं.
पांच महीने से मानदेय नहीं मिलने का दावा
मधुका देवी का कहना है कि पिछले लगभग पांच महीनों से उन्हें मानदेय का भुगतान नहीं किया गया है. उनका कहना है कि लगातार काम करने के बावजूद मेहनत की कमाई नहीं मिलने से घर की रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना मुश्किल हो गया हउनके सामने राशन, दवा और अन्य जरूरी खर्चों को लेकर आर्थिक परेशानी खड़ी होने का दावा किया गया है. सवाल यह है कि अगर कोई कर्मचारी लगातार अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है, तो उसके मेहनताने के भुगतान में इतनी लंबी देरी क्यों हो रही है

जिस परिसर को साफ करती हूं,वहीं अपने हक के लिए खड़ी हूं
मधुका देवी की स्थिति उस व्यापक सवाल की ओर भी इशारा करती है, जो अक्सर अनुबंध और अस्थायी कर्मचारियों के सामने आता है-क्या उन्हें समय पर उनके श्रम का भुगतान मिल रहा है? सफाई जैसे काम को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है, जबकि किसी भी शैक्षणिक संस्थान को स्वच्छ रखने में सफाईकर्मियों की भूमिका अहम होती है.मधुका देवी का कहना है कि उन्होंने वर्षों तक महाविद्यालय की व्यवस्था में अपना योगदान दिया, लेकिन अब अपने ही मेहनताने के लिए उन्हें गुहार लगानी पड़ रही है.
प्रशासन के सामने सवाल
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि मधुका देवी का मानदेय पांच महीने से लंबित क्यों है और इसके लिए जिम्मेदारी किसकी है? यदि भुगतान से संबंधित कोई प्रशासनिक या तकनीकी प्रक्रिया लंबित है, तो उसे जल्द पूरा किया जाना चाहिए, ताकि कर्मचारी को उसके श्रम का उचित भुगतान मिल सके. सरकार और संबंधित अधिकारियों से भी सवाल है कि जब श्रमिकों के सम्मान और उनके अधिकारों की बात की जाती है, तो फिर जमीन पर काम करने वाले कर्मचारियों को अपने ही मेहनताने के लिए लंबे समय तक इंतजार क्यों करना पड़ता है? फिलहाल मधुका देवी अपने बकाया मानदेय के भुगतान की मांग कर रही हैं. इस मामले में महाविद्यालय प्रशासन या संबंधित विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आने के बाद तस्वीर और स्पष्ट होगी.
यह मामला सिर्फ एक सफाईकर्मी के पांच महीने के मानदेय का नहीं है। यह उस व्यवस्था से जुड़ा सवाल भी है, जिसमें सबसे निचले पायदान पर काम करने वाले कर्मचारी को अपने श्रम का अधिकार पाने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है.
