RANCHI : झारखंड में प्रतियोगी परीक्षाओं में हुई कथित धांधलियों ने राज्य के प्रशासनिक ढांचे को कटघरे में खड़ा कर दिया है. जेपीएससी (JPSC) के पूर्व चेयरमैन एल. खियांगते और पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता दो ऐसे चेहरे जिन्होंने कभी देश की सर्वोच्च प्रशासनिक और पुलिस सेवा की परीक्षाएं पास की थीं, आज गंभीर आरोपों के घेरे में हैं. नीतिशास्त्र और निष्पक्षता का जिम्मा संभालने वाले शीर्ष अफसरों पर परीक्षा सिंडिकेट को संरक्षण देने और डिजिटल साक्ष्य मिटाने तक के आरोप लग रहे हैं.
एल. खियांगते पर डिजिटल सबूत मिटाने का आरोप
सीआईडी द्वारा अदालत में दाखिल केस डायरी के अनुसार, जेपीएससी के पूर्व चेयरमैन एल. खियांगते की भूमिका पर कई गंभीर सवाल खड़े हुए हैं:
- डेटा नष्ट करने की साजिश: गिरफ्तारी और जांच की आंच बढ़ते ही कंप्यूटर, लैपटॉप, हार्ड ड्राइव और पेन ड्राइव से महत्वपूर्ण डिजिटल डेटा डिलीट कराने और उपकरणों को नुकसान पहुंचाने के प्रयास दर्ज किए गए हैं.
- दागी एजेंसी का चयन: पहले से ब्लैकलिस्टेड कंपनी ‘टीडीपीएल’ (TDPL) को परीक्षा संचालन का जिम्मा सौंपा गया.
- गोपनीयता का उल्लंघन: परीक्षा पूर्व ही आंसर-की और संवेदनशील कागजात लीक होने की बात सामने आई.
- ओएमआर शीट्स में हेरफेर: एफआरओ (FRO) और एसीएफ (ACF) परीक्षाओं की ओएमआर शीट्स में सुनियोजित बदलाव कर मनचाहे अभ्यर्थियों को उत्तीर्ण कराने के आरोप हैं. सीआईडी के कॉल रिकॉर्ड्स और गवाहों के बयान एक संगठित तंत्र की ओर इशारा करते हैं.
पूर्व डीजीपी अनुराग गुप्ता पर संदिग्ध जांच और लीपापोती के आरोप
जेएसएससी-सीजीएल (JSSC-CGL) परीक्षा में सामने आई गड़बड़ियों के दौरान अनुराग गुप्ता राज्य के डीजीपी होने के साथ-साथ सीआईडी के डीजी का प्रभार भी संभाल रहे थे. जांच प्रक्रिया के दौरान कई असहज तथ्य सामने आए:
- व्हिसलब्लोअर पर कार्रवाई: वित्त विभाग के अधिकारी संतोष मस्ताना ने जब सीआईडी को पेपर लीक होने और करीब 1500 अभ्यर्थियों तक उत्तर पहुंचने की सूचना दी, तो मुख्य सरगनाओं को पकड़ने के बजाय मस्ताना पर ही कथित रूप से अफवाह फैलाने का मामला दर्ज कर जेल भेज दिया गया.
- मृतक को परीक्षा में पास दिखाने का मामला: सीआईडी की जांच फाइल में कथित तौर पर एक ऐसे व्यक्ति को परीक्षा पास दिखाया गया, जिसकी मृत्यु वर्ष 2018 में ही हो चुकी थी. इस लापरवाही ने समूची जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सवाल खड़े कर दिए.
राजनीतिक घमासान सीबीआई जांच की मांग
पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी ने सोशल मीडिया के जरिए सरकार और जांच एजेंसियों पर सीधा हमला बोला है:
“नेपाल, बिहार और बंगाल में 135 में से 122 सवाल रटवा दिए गए. प्राथमिक आचार्य नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद धांधली हुई, फिर भी जेएसएससी के अफसरों पर कोई आंच नहीं आई. 2018 में मरे हुए इंसान से परीक्षा दिलवा दी गई! पहली जांच के सबूत अनुराग गुप्ता के समय प्रभावित हुए, बाकी बचे सबूत खियांगते के स्तर पर मिटाए गए.राज्य सरकार महंगे वकीलों के सहारे तारीख लेने के बजाय सुप्रीम कोर्ट में अविलंब सीबीआई जांच की सहमति दे, ताकि मुख्य आरोपी डिफॉल्ट बेल का लाभ न उठा सकें.”
प्रतियोगी छात्रों के सामने संकट
सालों तक सीमित संसाधनों में तैयारी करने वाले लाखों युवाओं के सामने आज सबसे बड़ा सवाल अपनी मेहनत के मूल्य का है. जिस तंत्र पर निष्पक्ष चयन की जिम्मेदारी थी, उसी तंत्र के शीर्ष पदों पर बैठे लोगों की संदिग्ध भूमिका ने प्रशासनिक विश्वसनीयता को गहरा आघात पहुंचाया है. अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि क्या इस पूरे प्रकरण की जांच सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में किसी स्वतंत्र केंद्रीय एजेंसी को सौंपी जाएगी, ताकि साक्ष्य नष्ट करने वाले संगठित सिंडिकेट पर सख्त कार्रवाई हो सके.
