RANCHI : एक तरफ जहां पूरा विश्व नारी शक्ति को सम्मान देते हुए 8 मार्च को महिला दिवस मना रहा है. इनकी नित नई उपलब्धियों को छूती महिलाओं के लिए उत्सव माना रहा है. जहां आज महिलाएं हर क्षेत्र में उपलब्धियों के झंडे गाड़ रहीं हैं. कोई ऐसा क्षेत्र अछूता नहीं है जिसे महिलाओं ने अपनी प्रतिभा के दम पर छुआ नया हो. वहीं एक काला सच इन उपलब्धियों को गौण कर देती है, वह है अंधविश्वास की शिकार महिलायें.
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यह सच है कि आज भी डायन जैसे अंधविश्वास का शिकार प्रायः महिलाएं बनती हैं. झारखंड के ग्रामीण इलाकों में यह समस्या बेहद नजर आती है, खासकर आदिवासी इलाकों में. महिलाओं को डायन होने के शक के आधार पर सरेआम मौत के घाट उतार दिया जाता है.
इसके पीछे सबसे बड़ा कारण अशिक्षित होना है. दरअसल साक्षर और शिक्षित में बड़ा अंतर है. साक्षर अर्थात जिसे केवल अक्षरों का ज्ञान हो जिसे केवल पढ़ना-लिखना और अपना नाम लिखना आता है. और जिसे केवल डिग्री से मापा जाता है.
जबकि शिक्षित वह है जिसे न केवल अकादमिक ज्ञान प्राप्त है बल्कि सही-गलत की समझ है, तर्कों पर विचारों को गढ़ता है. जिसे नैतिकता और व्यवहार की समझ है. जिसे केवल किसी डिग्री से नहीं बल्कि चरित्र और व्यवहार से मापा जा सकता है.
इतनी सारी बातों का सार यह है कि वर्तमान शिक्षा पद्धति में छात्रों को केवल साक्षर बनाया जा रहा है, उनमें तर्क, सही गलत में फर्क करने की क्षमता, नैतिकता की कमी साफ दिखती है.
स्कूलों में उन्हें अंधविश्वास के विषय में विस्तृत और निष्पक्ष रूप से पढ़ाने की जरूरत है. आज डायन-बिसाही जैसे अंधविश्वास के आरोप में निर्दोष महिलाओं की निर्ममता से जान ले ली जाती है. अंधविश्वास के कारण महिलाओं या लड़कियों को कई यातनाओं से गुजरना पड़ता है.
चाईबासा में एक ऐसा ही मामला देखने को मिला जहां अंधविश्वास के चक्कर में एक लड़की के व्यवहार में बदलाव आने पर, उस पर भूत सवार होने के शक पर उसे बांध कर रखा गया और उसे उसी हालत में झाड़-फूंक कराने के लिए ओझा के पास ले गए. इस स्थिति में जहां उसे डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए था, उसे ओझा-गुणी के पास ले जाया गया.
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लड़की को बांध कर रखने के आरोप पर लड़की के परिजनों का कहना है कि उसकी हरकतें देखकर उन्हें लगा कि उसके ऊपर भूत या किसी की परछाई सवार हो गई है. उसके अजीब व्यवहार के कारण ही उसे बांधा गया ताकि वह कहीं चली ना जाए.
