RAMGARH : हेमंत सोरेन की पहचान केवल एक राजनेता के रूप में नहीं, बल्कि अपनी जड़ों, परंपराओं और संस्कृति से गहराई से जुड़े जननेता के रूप में भी होती है. सत्ता के सर्वोच्च पद पर रहते हुए भी जिस तरह वे अपनी मिट्टी, अपने गांव और अपनी परंपराओं के साथ खड़े नजर आते हैं, वह उन्हें बाकी नेताओं से अलग बनाता है.
इसकी एक झलक उस समय देखने को मिली, जब मुख्यमंत्री अपने पैतृक गांव नेमरा में आयोजित पारंपरिक ‘बाहा पर्व’ में सपरिवार शामिल होने पहुंचे. हर वर्ष की तरह इस बार भी उन्होंने किसी औपचारिक मंच या राजनीतिक कार्यक्रम के बजाय अपने गांव की परंपरा को प्राथमिकता दी. वे ग्रामीणों के साथ पदयात्रा करते हुए अपने निवास से नेमरा स्थित ‘जाहेर थान’ तक पहुंचे और वहां पारंपरिक विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना कर राज्यवासियों की सुख, समृद्धि, खुशहाली और उन्नति की कामना की.
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बाहा पर्व में ग्रामीणों के साथ मांदर बजाते दिखे मुख्यमंत्री
पूजन कार्य गांव के नाइके बाबा (पाहन) चैतन टुडू और कुडम नाइके बाबा (उप पाहन) छोटू बेसरा ने संपन्न कराया. इस दौरान नेमरा और आसपास के क्षेत्रों के ग्रामीण ढोल-नगाड़ा और मांदर की थाप के साथ मुख्यमंत्री के साथ जाहेर थान पहुंचे. माहौल पूरी तरह पारंपरिक और उत्सवमय था. खास बात यह रही कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी इस उत्साह में पूरी तरह शामिल हुए और खुद मांदर बजाकर ग्रामीणों का उत्साह बढ़ाया. यह दृश्य केवल एक पर्व का नहीं, बल्कि उस जुड़ाव का प्रतीक था जो एक नेता और अपनी संस्कृति के बीच होना चाहिए.
दरअसल, यह पहली बार नहीं है जब हेमंत सोरेन ने अपनी जड़ों से जुड़ाव का संदेश दिया हो. इससे पहले भी जब झारखंड आंदोलन के महानायक और उनके पिता ‘गुरुजी’ शिबू सोरेन के देहांत के बाद पारंपरिक रीति-रिवाजों और संस्कारों को निभाने का समय आया, तब मुख्यमंत्री होने के बावजूद हेमंत सोरेन ने खुद आगे बढ़कर उन सभी परंपराओं को पूरी श्रद्धा और जिम्मेदारी के साथ निभाया. उस समय भी लोगों ने उनकी इस सादगी और परंपराओं के प्रति सम्मान की खूब सराहना की थी. यह संदेश साफ था कि पद कितना भी बड़ा क्यों न हो, इंसान की असली पहचान उसकी जड़ों और अपने पुरखों से जुड़ाव में ही होती है. हेमंत सोरेन बार-बार अपने आचरण से यही बताते हैं कि सत्ता का मतलब परंपराओं से दूरी नहीं, बल्कि उन्हें और सम्मान देना होना चाहिए.

राजनीति से ऊपर संस्कृति का सम्मान
नेमरा में ‘बाहा पर्व’ के दौरान जब मुख्यमंत्री ग्रामीणों के साथ मांदर की थाप पर चलते नजर आए, तो यह दृश्य केवल एक मुख्यमंत्री का नहीं, बल्कि अपनी संस्कृति, अपनी मिट्टी और अपने लोगों से जुड़े एक सच्चे झारखंडी बेटे का था. शायद यही कारण है कि झारखंड की जनता उन्हें केवल एक नेता नहीं, बल्कि अपने बीच का इंसान मानती है.
आज जब राजनीति में अक्सर जड़ों से कटने की चर्चा होती है, तब हेमंत सोरेन का यह व्यवहार एक मजबूत संदेश देता है – कि चाहे आप कितने ही बड़े पद पर क्यों न पहुंच जाएं, अपनी पहचान और अपने पुरखों की परंपराओं को कभी नहीं भूलना चाहिए. यही जुड़ाव उन्हें लोगों के दिलों के और करीब लाता है और यही उनकी सबसे बड़ी ताकत भी है.
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