RANCHI/BOKARO : बोकारो में पिछले 12 दिनों से विस्थापितों के हक और अप्रेंटिस संघ के नौजवानों की नौकरी की मांग को लेकर चल रहा बड़ा आंदोलन आखिरकार बहुत ही शांतिपूर्ण और प्यार भरे माहौल में समाप्त हो गया. शहर में एक तरफ दुर्गापूजा का उल्लास, डांडिया की धूम, बाजारों की खचाखच भीड़ और दूसरी तरफ विस्थापितों का यह उग्र होता आंदोलन, माहौल बेहद संवेदनशील था. किसी भी वक्त हालात बिगड़ सकते थे, लेकिन जिला प्रशासन की सूझबूझ और विनम्रता ने एक बहुत बड़े टकराव को टाल दिया.
पिछले 12 दिनों से क्यों परेशान थे जिले के ये पांच बड़े चेहरे?
इस पूरे घटनाक्रम के केंद्र में पांच प्रमुख प्रशासनिक और पुलिस अधिकारी थे, जो दिन-रात एक किए हुए थे. बोकारो उपायुक्त (DC) अजय नाथ झा, बोकारो पुलिस अधीक्षक (SP) नाथू सिंह मीना ,चास अनुमंडल पदाधिकारी (SDO) प्रांजल ढांडा (IAS) ,सेक्टर-4 थाना प्रभारी नितीश , सिटी थाना प्रभारी ममता कुमारी. ये अधिकारी इसलिए परेशान नहीं थे कि किसी भी तरह से लाठी चलाकर या तोड़फोड़ करके धरने को जबरन उठा दिया जाए. अंदर से उन्हें यह बात खाए जा रही थी कि जब पूरा शहर दुर्गापूजा मना रहा है, तो जो लोग अपनी मांगों को लेकर सड़क पर भूख-प्यास के बीच धरने पर बैठे हैं, उनकी और उनके परिवारों की दुर्गापूजा कैसे मनेगी? इसी मानवीय संवेदना के चलते बोकारो के इतिहास में शायद पहली बार ऐसा देखा गया कि किसी विस्थापित आंदोलन में जिले के डीसी खुद बार-बार धरना स्थल पर पहुंच रहे थे. डीसी अजय नाथ झा तीन बार खुद मौके पर गए, आंदोलनकारियों का हालचाल जाना और लगातार उनका हौसला बनाए रखा.

वो नाजुक मोड़ जब बंद हुए BSL के गेट
आंदोलन के बीच एक ऐसा समय भी आया जब लगा कि प्रशासन और ग्रामीणों के बीच सीधा टकराव तय है. आंदोलनकारियों ने रणनीति के तहत पहले बीएसएल (BSL) के गेट नंबर 8, 9 और 10 को बंद कराया. अगले दिन अन्य सभी गेट बंद कर दिए गए और अंततः प्लांट का मेन गेट भी बंद कर दिया गया. मेन गेट बंद होने का सीधा मतलब था कि प्लांट के भीतर प्रोडक्शन पूरी तरह ठप हो जाना. अगर स्टील का प्रोडक्शन रुकता तो जिला प्रशासन पर भारी दबाव बनता, क्योंकि प्लांट बंद होने की आंच ऊपर तक पहुंचती और ऊपर से कड़ा एक्शन लेने का निर्देश आता.
लेकिन इतने भारी दबाव के बावजूद, एसपी नाथू सिंह मीना, डीसी अजय नाथ झा, एसडीओ प्रांजल ढांडा , सिटी थाना प्रभारी ममता कुमारी और सेक्टर-4 थाना प्रभारी नितीश की सूझबूझ काम आई. पुलिस ने एक बार भी सख्ती या लाठी का सहारा नहीं लिया. नतीजा यह हुआ कि बिना किसी लाठीचार्ज या झड़प के, विस्थापितों का आंदोलन भी शांति से चला और बीच का रास्ता निकालकर गेट भी सुचारू करा लिए गए.

क्रेडिट की होड़ से दूर, इन पांच अफसरों का विनम्र व्यवहार
आमतौर पर आंदोलन खत्म होने के बाद नेता और सेल (SAIL) के बड़े अधिकारी क्रेडिट लेने आगे आ जाते हैं। लेकिन पर्दे के पीछे जिन लोगों ने दिन-रात एक किया, वो यह चार अधिकारी ही थे. डीसी लगातार सेल प्रबंधन और विस्थापितों के बीच मैराथन बैठकें कर रहे थे. एक जिले के अधिकारी पर कितना मानसिक दबाव होता है, यह बाहर से कभी नजर नहीं आता.
इस पूरे घटनाक्रम में सिटी थाना ममता कुमारी, सेक्टर-4 थाना प्रभारी नितीश की ग्राउंड पुलिसिंग और एसपी नाथू सिंह मीना का बेहद विनम्र व संयमित व्यवहार काबिले-तारीफ रहा. डीसी और आईएएस प्रांजल ढांडा ने जिस तरीके से हर पेच को टेबल टॉक के जरिए सुलझाया, उसी का नतीजा था कि इतने बड़े आंदोलन में पुलिस और विस्थापित आमने-सामने नहीं टकराए.
अंतिम बैठक में क्या-क्या फैसले हुए?
काफी मान-मनौव्वल और लंबी बैठकों के बाद कल हुई अंतिम वार्ता में अहम बिंदुओं पर सहमति बनी, जिसके बाद आंदोलन और भूख हड़ताल को समाप्त कराया गया.
चतुर्थ वर्ग में स्थायी नियोजन का प्रस्ताव: विस्थापित परिवार के सदस्यों को BSL में चतुर्थ वर्ग (Grade-4) के पदों पर पक्की नियुक्ति देने के लिए एक स्पष्ट नियोजन नीति तैयार करने की मांग का प्रस्ताव माननीय विधायक श्वेता सिंह के माध्यम से उपायुक्त बोकारो और बीएसएल के निदेशक प्रभारी को सौंपा गया.
1,500 अप्रेंटिस प्रशिक्षितों को काम का प्रस्ताव: विस्थापित परिवारों के लगभग 1,500 ऐसे नौजवान जिन्होंने अप्रेंटिस ट्रेनिंग पूरी कर ली है, उन्हें बीएसएल में अस्थायी नियोजन (काम) देने से जुड़ा प्रस्ताव भी विधायक के जरिए डीसी और प्रबंधन को दिया गया.
7 दिनों के भीतर सीएम और सीएमडी तक फाइल भेजने का निर्णय: विधायक की तरफ से मिले इन दोनों प्रस्तावों को निदेशक परियोजना भूमि एवं पुनर्वास (DPLR) बोकारो द्वारा 7 दिनों के अंदर झारखंड सरकार के गृह विभाग के माध्यम से माननीय मुख्यमंत्री के समक्ष विचार के लिए भेजा जाएगा.
वहीं, बीएसएल प्रबंधन भी इन दोनों प्रस्तावों को 7 दिनों के भीतर सेल (SAIL) के अध्यक्ष-सह-प्रबंध निदेशक (CMD) को आगे की कार्रवाई के लिए भेजेगा.
भूख हड़ताल और धरना पूरी तरह समाप्त: वार्ता में इन फैसलों पर सहमति बनते ही विस्थापित संघ के प्रतिनिधियों ने तुरंत प्रभाव से अपना धरना-प्रदर्शन और भूख हड़ताल खत्म करने का ऐलान कर दिया. इसके बाद खुद डीसी अजय नाथ झा धरना स्थल पहुंचे और अनशनकारियों को जूस पिलाकर धरना समाप्त कराया.
जनप्रतिनिधियों का भी रहा पूरा साथ
इस आंदोलन में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी काफी अहम रही. बोकारो विधायक श्वेता सिंह के लिए दुर्गापूजा का समय था, उन्हें क्षेत्र में जाना था, पूजा-पंडालों में शामिल होना था और परिवार के साथ त्योहार मनाना था. लेकिन वे सब कुछ छोड़कर लगातार 11 दिनों तक धरना स्थल पर विस्थापितों के साथ डटी रहीं. वहीं धनबाद सांसद ढुलू महतो भी दो-दो बार धरना स्थल पहुंचे, अपने समर्थकों को साथ लेकर आए और विस्थापितों की आवाज को मजबूती दी.
जनप्रतिनिधियों का समर्थन अपनी जगह था, लेकिन दुर्गापूजा के सबसे संवेदनशील माहौल में, बिना एक भी लाठी चलाए और बिना किसी विवाद के, बातचीत की मेज पर इस पूरे मसले का हल निकाल लेना वास्तव में बोकारो जिला प्रशासन की एक बहुत बड़ी कामयाबी है.
