DEVGHAR : निशिकांत दूबे के बड़बोलेपन और कथित घमंड के साथ-साथ रवि कुमार राउत की मजबूत जमीनी पकड़ ने पूरा चुनावी समीकरण पलट कर रख दिया. नतीजा यह हुआ कि संताल परगना की राजनीति के केंद्र माने जाने वाले देवघर में भाजपा को करारी शिकस्त का सामना करना पड़ा. भाजपा का अभेद्य गढ़ कहे जाने वाले देवघर नगर निगम में इस बार सियासी जमीन खिसक गई.देवघर जिले के नगर निकाय चुनाव परिणामों ने राज्य की सत्ताधारी और विपक्षी दोनों ही पार्टियों के गणित को झकझोर दिया है. प्रतिष्ठित मेयर पद पर झामुमो ने जीत दर्ज कर सबको चौंका दिया. भाजपा ने इस चुनाव को अपनी प्रतिष्ठा का प्रश्न बना लिया था. राष्ट्रीय से लेकर प्रदेश स्तर तक के नेताओं की फौज उतार दी गई, लेकिन इसके बावजूद पार्टी यह अहम सीट हार गई.
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भाजपा की इस हार के पीछे गोड्डा सांसद निशिकांत दूबे का एक बयान भी बड़ा कारण माना जा रहा है. चुनावी रैली के दौरान उन्होंने कहा था, “JMM और कांग्रेस के लोगों को पैसा नहीं दूंगा. जब भारतीय जनता पार्टी का मेयर बनेगा, तभी 5000 करोड़ दूंगा.” इस बयान को झामुमो प्रत्याशी रवि कुमार राउत के समर्थकों ने चुनावी हथियार बना लिया. देवघर की आम जनता के बीच भी इस टिप्पणी को लेकर नाराजगी देखी गई. विरोधियों ने इसे ‘अहंकार’ और ‘भेदभाव’ से जोड़कर पेश किया, जिसका खामियाजा भाजपा को सीट गंवाकर भुगतना पड़ा.भाजपा ने मेयर पद की अपनी समर्थित प्रत्याशी रीता चौरसिया के पक्ष में पूरी ताकत झोंक दी थी. बड़े नेताओं ने देवघर में डेरा डाला, ताबड़तोड़ बैठकें की गईं और माइक्रो-मैनेजमेंट के जरिए मतदाताओं को साधने की कोशिश की गई. लेकिन मतदान के दिन वह अपेक्षित लहर जमीन पर नजर नहीं आई. अंततः रीता चौरसिया को झामुमो के रवि कुमार राउत के हाथों हार का सामना करना पड़ा.
विश्लेषकों के मुताबिक, भाजपा की रणनीति में स्थानीय मुद्दों की अनदेखी भी भारी पड़ी. निकाय चुनाव जैसे स्थानीय चुनाव में जनता शहर की बुनियादी समस्याओं – सफाई, जल निकासी, सड़क, ट्रैफिक और विकास पर जवाब चाहती थी, जबकि भाजपा का प्रचार अभियान राष्ट्रीय मुद्दों के इर्द-गिर्द घूमता रहा.इसके अलावा, देवघर में भाजपा के भीतर चल रही गुटबाजी ने भी आग में घी का काम किया. पार्टी के बागी नेता नागेंद्र नाथ बलियासे निर्दलीय मैदान में उतर गए और भाजपा के कोर वोट बैंक में सेंध लगा दी. अपनों की इस बगावत ने समर्थित प्रत्याशी की राह और कठिन बना दी, जिसका सीधा फायदा विरोधी खेमे को मिला. देवघर के नतीजों ने साफ कर दिया है कि स्थानीय राजनीति में जमीनी पकड़ और जनता का विश्वास किसी भी बड़े नाम या बाहरी ताकत से ज्यादा अहम होता है. संताल परगना की सियासत में यह बदलाव आने वाले विधानसभा चुनावों की दिशा भी तय कर सकता है.
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