Nakib Ziya
RANCHI : झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और गांडेय विधायक कल्पना सोरेन की चुनावी सक्रियता अब एक नए राजनीतिक मोड़ की ओर इशारा कर रही है. असम में ताबड़तोड़ प्रचार के बाद दोनों नेताओं को लेकर सियासी गलियारों में हलचल तेज हो गई है. चर्चा है कि उनका अगला पड़ाव पश्चिम बंगाल हो सकता है.
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राजनीतिक नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या हेमंत सोरेन बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए चुनाव प्रचार करेंगे. अगर ऐसा होता है, तो इसका सीधा असर राज्य के चुनावी समीकरण पर पड़ सकता है.
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे अहम भूमिका आदिवासी वोट बैंक की मानी जा रही है. पश्चिम बंगाल में आदिवासी आबादी करीब 5 से 6 प्रतिशत के बीच है. लेकिन कई सीटों पर यही वर्ग किंगमेकर की भूमिका निभाता है. खासकर झारग्राम, पुरुलिया, बांकुड़ा और अलीपुरद्वार जैसे इलाकों में आदिवासी मतदाता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने की ताकत रखते हैं.
हेमंत सोरेन की पहचान एक मजबूत आदिवासी नेता के रूप में रही है. ऐसे में उनकी मौजूदगी सीमावर्ती क्षेत्रों में मतदाताओं को प्रभावित कर सकती है. यही वजह है कि उनकी संभावित एंट्री को तृणमूल कांग्रेस के लिए गेम चेंजर माना जा रहा है.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगर हेमंत सोरेन और कल्पना सोरेन बंगाल में सक्रिय होते हैं. तो इसका सीधा फायदा तृणमूल कांग्रेस को मिल सकता है. वहीं विपक्ष, खासकर भाजपा के लिए यह चुनौती बढ़ा सकता है.
अब देखना दिलचस्प होगा कि ये सियासी कयास हकीकत में बदलते हैं या नहीं. लेकिन इतना तय है कि अगर सोरेन दंपति बंगाल में उतरते हैं. तो यह सिर्फ चुनाव प्रचार नहीं, बल्कि पूरे चुनावी खेल को बदलने वाला कदम साबित हो सकता है.
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