Akshay Kumar Jha
RANCHI : 2 जनवरी के बाद से जैसे रांची शहर में मातम फैला हुआ था. नए साल की खुशी की खुमारी काफी जल्दी उतर गयी. अंश-अंशिका के गायब होने बाद रांची पुलिस पर तरह-तरह के सवाल उठने लगे थे. एक पुलिस मित्र ने अपहरण की घटना के चार दिन बताया कि “भैया जानते हैं, पुलिस को कोई भी सुराग नहीं मिल रहा है”. स्निफर डॉग का दिखावा. सीसीटीवी फुटेज का जाल और पुलिस का टेक्निकल सेल सब फेल हो रहे थे. पुलिस के लिए यह अपहरण कांड एक चैलेंज जैसा हो गया था. एक समय तो ऐसा आया कि पुलिस को समझ में ही नहीं आ रहा था कि जांच किस दिशा में बढ़ायी जाए. रांची के धुर्वा इलाके के लोगों में गुस्सा साफ तौर से देखा जा रहा था. संगठन और गुट बनने लगे. मशाल जुलूस, रैली और भाषणों में गुस्सा बढ़ने लगा. राजनीतिक रोटियां भी सेंकी गयीं. बीजेपी ने एसएसपी के कार्यालय के घेराव किया. लेकिन नतिजा सिफर ही था. अंश-अंशिका ना जाने कहां चले गए थे. उसकी मां की आंखें रोते-रोते पथरा गयी थीं. पिता का सब्र अब जवाब ही देने वाला था कि एक करिश्मा होता है. इसे वाकई करिश्मा ही कहेंगे. क्योंकि जो हुआ, वो पुलिस की काबिलयत से परे था. ये था आम आदमी की हिम्मत, सोशल मीडिया की ताकत.
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सचिन और डब्लू को मिलनी चाहिए पूरी क्रेडिट
अंश-अंशिका के मिलने के बाद पुलिस पूरी क्रेडिट ले रही है. लेनी भी चाहिए. निःसंदेह रांची और झारखंड पुलिस ने सारी ताकत लगा दी थी. झारखंड के अलावा दूसरे राज्यों में अंश-अंशिका को ढूढ़ा जा रहा था. पोस्टरबाजी और टेक्निकल इनपुट के जैसे तमाम तरह के हथकंडे पुलिस आजमा रही थी. लेकिन जो काम आया वो काबिले-तारीफ रहा. काम आए सचिन और डब्लू. सोशल मीडिया पर उन दोनों ने अपनी बात भी रखी है. हुआ ऐसा कि सचिन और डब्लू घूमते हुए रामगढ़ के चितरपुर इलाके पहुंचे. अहमदनगर में उन दोनों की नजर इन बच्चों पर पड़ी. रांची से बच्चों के अपहरण की खबर यह दोनों फॉलो कर रहे थे. उन्हें शक हुआ. तो उन्होंने मोबाइल से दोनों बच्चे की फोटो ली. फिर सोशल मीडीया पर जाकर वो पोस्टर खोजा, जिसमें अंश-अंशिका के घरवालों का फोन नंबर था. फोन नंबर पर बात करने के बाद उन्होंने बच्चों की तस्वीर उनके मां-पिता को भेजी. कन्फर्म होने के बाद सचिन और डब्लू ने रजरप्पा थाने को फोन किया. पुलिस एक्शन में आयी. फौरन किडनैपर के घर से बच्चों को छुड़ाया. और उसके बाद जो हुआ वो सब जानते हैं.
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तो फिर ईनाम की राशि किसे मिलनी चाहिए
पुलिस लगातार अंश-अंशिका को ढूढ़ रही थी. हाथ कुछ नहीं आ रहा था सिवाय निराशा के. फिर पुलिस ने घोषणा की कि जो भी बच्चों के बारे इनपुट देगा उसे ईनाम मिलेगा. रकम सिर्फ पचास हजार की थी. पुलिस जैसे-जैसे बेदम हो रही थी, ईनाम की राशि बढ़ रही थी. अब ईनाम की राशि चार लाख रुपए हो गयी थी. अंश-अंशिका के मिलने के बाद अब यह ईनाम राशि का हकदार कौन है? यह भी एक सवाल है. बताते चलें कि पुलिस बच्चों को खोजने में नाकाम और बेदम थी. अगर सचिन और डब्लू नहीं होते तो शायद ही डीजीपी महोदया रांची पुलिस मुख्यालय में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर रही होती और शायद ही हमारे मुख्यमंत्री एक्स प्लेटफॉर्म पर खुशी जाहिर कर रहे होते.
