Akshay Kumar Jha
NEW DELHI/RANCHI : झारखंड से राज्यसभा सांसद दीपक प्रकाश ने संसद में देश की प्राचीनतम आदिवासी संस्कृतियों—उरांव और संथाल समाज—की धरोहरों को संरक्षित करने का मुद्दा प्रमुखता से उठाया. उन्होंने सरकार से मांग की कि झारखंड और बिहार की सीमाओं में फैले ऐतिहासिक स्थलों रोहतासगढ़, मुड़मा और मारंग बुरु को जोड़कर एक ‘विशिष्ट सांस्कृतिक कॉरिडोर’ विकसित किया जाए.
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विरासत से ही आदिवासियत की पहचान
सदन को संबोधित करते हुए सांसद ने काव्य पंक्तियों के माध्यम से आदिवासियों के गौरव का बखान किया:
“जहां पुरखों की खुशबू है, जहां आस्था का डेरा है, वो रोहतासगढ़, वो मुड़मा, वो मारंग बुरु, पहचान का सवेरा है!”
उन्होंने जोर देकर कहा कि रोहतासगढ़ (बिहार) उरांव समाज के शौर्य और उनके पूर्वजों की अमिट स्मृतियों का केंद्र है. वहीं, रांची के मांडर स्थित ‘मुड़मा स्थल’ न केवल धार्मिक शक्ति खूंटा का प्रतीक है, बल्कि यह उस ‘पड़हा शासन व्यवस्था’ की जननी है, जिसने आदिवासी समाज को सदियों से एक सूत्र में पिरोए रखा है.
मारंग बुरु आदिवासियों के अस्तित्व की पहचान
संथाल समाज की आस्था का उल्लेख करते हुए सांसद दीपक प्रकाश ने कहा कि ‘मारंग बुरु’ (पारसनाथ पर्वत) संथालों के सर्वोच्च देवता हैं. यह केवल एक पहाड़ नहीं, बल्कि करोड़ों आदिवासियों के अस्तित्व की पहचान है. उन्होंने खेद व्यक्त किया कि ये वैश्विक स्तर की धरोहरें आज भी सड़क, बिजली, पेयजल जैसे बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही हैं.
श्री प्रकाश ने सरकार से आग्रह किया है कि मुड़मा, मरांगबुरू और रोहतासगढ़ को जोड़कर एक विशिष्ट कॉरिडोर का निर्माण किया जाय ताकि देश ही नहीं बल्कि दुनिया भी भारत की आदिवासी सभ्यता, संस्कृति और गौरवशाली इतिहास से रूबरू हो सके.
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