RANCHI: रांची नगर निगम चुनाव की चर्चा जैसे ही शुरू होती है, एक नाम अपने आप ज़ुबान पर आ जाता है –रमा खल्खो. रांची की पहली आदिवासी महिला मेयर रमा एक बार फिर चुनावी मैदान में उतरने जा रही हैं. बस इसी खबर ने रांची की राजनीति में हलचल तेज कर दी है। सियासी गलियारों से लेकर गली-मोहल्लों तक एक ही सवाल गूंज रहा है. क्या इस बार रांची की किस्मत बदल जाएगी?
जब नाम से ही बदलने पड़े उम्मीदवार
रमा खल्खो का नाम ऐसा है, जिसे देखकर राजनीतिक दलों को अपनी रणनीति बदलनी पड़ती है. उनके प्रभाव का अंदाज़ा इसी बात से लगाया गया था कि भाजपा तक को अपने उम्मीदवार बदलने पड़े . इस बार कांग्रेस से उनकी एंट्री ने मुकाबले को और भी दिलचस्प बना दिया है.
2008: जब रांची को मिली पहली आदिवासी महिला मेयर
झारखंड के बिहार से अलग होने के बाद 2008 में पहली बार नगर निगम चुनाव हुआ. यह चुनाव बेहद अहम था, क्योंकि यह राजधानी रांची की कुर्सी का चुनाव था. सीट आदिवासी महिला के लिए आरक्षित थी. तय था कि मेयर कोई आदिवासी बेटी ही बनेगी, लेकिन सवाल था कौन? उसी समय राजनीति के मैदान में उतरीं एक युवा, तेजतर्रार और बेबाक आदिवासी महिला –रमा खल्खो. उन्होंने 45 हजार से अधिक वोटों के भारी अंतर से जीत दर्ज कर इतिहास रच दिया. यह पहला मौका था जब मेयर और डिप्टी मेयर का सीधा चुनाव हुआ. जनता उम्मीदों से भरी थी और रमा उन उम्मीदों का चेहरा बनकर उभरीं.
संघर्ष की शुरुआत: 2000 से सत्ता से टकराव
रमा खल्खो कोई अचानक उभरा नाम नहीं हैं. उनकी संघर्षगाथा साल 2000 से शुरू होती है, जब वे आदिवासी जनाधिकार मंच से जुड़ीं. कम उम्र में ही बड़े-बड़े आंदोलनों की अगुवाई करना उनके लिए सामान्य बात बन गया.
अर्जुन मुंडा सरकार के दौरान शिक्षक नियुक्ति घोटाला, झारखंड आंदोलन के दौरान पुलिस फायरिंग -हर मौके पर रमा खल्को सत्ता से टकराती नजर आईं.
लाठी, गोली और आंदोलन—लेकिन आवाज नहीं रुकी
2007 ओडिशा गोलीकांड में 12 आदिवासियों की मौत पर खुलकर विरोध
हरमू पुल–चडरी मसना मामले में पुलिस की लाठियां
हेनू जमीन बचाओ आंदोलन में लछु पहान की हत्या के बाद हजारों लोगों के साथ शव लेकर राजभवन कूच
हर बार हालात बेकाबू थे, लेकिन उस भीड़ और सत्ता के सामने अकेली खड़ी रही वही बेबाक आदिवासी महिला –रमा .
2026: फिर आमने-सामने सत्ता और रमा खल्खो
अब जब 2026 के नगर निगम चुनाव में रमा खल्को एक बार फिर मैदान में उतरने की तैयारी में हैं, तो यह मुकाबला किसी एक उम्मीदवार से नहीं, बल्कि सीधे सत्ता से टकराव है.
यह चुनाव सिर्फ मेयर चुनने का नहीं होगा, बल्कि यह तय करेगा कि
क्या रांची फिर से एक निडर, बेबाक और जनपक्षधर आदिवासी महिला की आवाज चुनेगी?
और यही सवाल इस चुनाव को सबसे ज़्यादा खतरनाक और दिलचस्प बना रहा है.
