Sunita Munda
RANCHI : क्या आदिवासी भाषाएं इस देश की स्वयंभू मीडिया को समझ में नहीं आती? या फिर उसे सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी ही समझ आती है – या सच कहें तो सिर्फ मोदी जी ही समझ में आते हैं? प्रधानमंत्री मोदी के हाथ में गमछा लेकर हवा में लहराना ब्रेकिंग न्यूज़ बन जाती है. सिख पगड़ी पहन लेना खबर बन जाती है. दक्षिण भारत की भाषा में “वणक्कम” बोल देना एक्सक्लूसिव कहलाता है. और अगर मोदी जी गाना गा दें, तो मानो भारतीय मीडिया को अगले दस दिनों का मसाला मिल जाता है.
लेकिन सवाल यह है – क्या भारत की मुख्यधारा मीडिया को हिंदी और अंग्रेजी के अलावा बाकी आवाजें सुनायी नहीं देतीं? क्या आदिवासी संस्कृति और भाषाओं की कोई अहमियत नहीं है? क्या संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख जैसी भाषाओं के लिए देश की मीडिया में कोई जगह नहीं है? या फिर इस देश की मीडिया में भारत की 12 करोड़ से अधिक आबादी वाले आदिवासी समाज के लिए कोई सम्मान ही नहीं है?
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क्या संथाली, मुंडारी, हो और कुड़ुख सिर्फ वोट लेने की भाषाएं हैं, खबरों की नहीं? थोड़ा कन्फूजन है? क्या है पूरा मामला हम आपको समझाते हैं. आपको जानकारी है कि माननीय राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू तीन दिनों तक झारखंड प्रवास पर रहीं. जमशेदपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान उन्होंने संथाली भाषा में एक गीत भी गाया. झारखंड के लगभग हर छोटे-बड़े मीडिया चैनल ने इस खबर को प्रमुखता से जगह दी.
लेकिन देश के महंगे कैमरों और दिल्ली-केंद्रित राष्ट्रीय मीडिया चैनलों के लिए यह कोई खबर नहीं थी. यहीं से एक असहज सवाल खड़ा होता है- जब प्रधानमंत्री मोदी किसी राज्य में जाते हैं और वहां की स्थानीय भाषा में दो पंक्तियां बोल देते हैं, तो वह नेशनल हेडलाइन बन जाता है. प्रधानमंत्री ने भोजपुरी में कहा…प्रधानमंत्री ने मराठी में संबोधन दिया…प्रधानमंत्री ने तमिल में बात की…इतना दिखाया – सुनाया जाता है कि मानो कोई एहसान कर दिया गया हो.
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यहां तक कि बिहार में दिया गया “मारब सिक्सर के छह गोली छाती में रे” जैसा संवाद भी पूरे देश की मीडिया में ब्रेकिंग न्यूज बन जाती है. लेकिन जब इस देश की राष्ट्रपति – जो स्वयं एक आदिवासी हैं – संथाली भाषा में गीत गाती हैं, तो देश की मीडिया चुप्पी साध लेती है. किसी ने यह जानने की कोशिश तक नहीं की कि माननीय महामहिम ने गीत में क्या गुनगुनाया, क्या संदेश दिया, और हमारी राष्ट्रपति ने अपनी भाषा में क्या कहा.
सवाल यह नहीं है कि खबर क्यों नहीं चली. सवाल यह है कि किसकी भाषा को खबर माना जाए और किसकी भाषा को नहीं? यह फैसला आखिर नोएडा के लग्जरी दफ्तरों में क्यों तय होता है? क्या देश की बड़ी मीडिया सिर्फ हिंदी और अंग्रेजी ही समझती है, या फिर उसे सिर्फ वही भाषा समझ आती है जो सत्ता के केंद्र से बोली जाए?
क्योंकि अगर स्थानीय भाषा में बोलना संस्कृति का सम्मान है, तो फिर यह सम्मान सिर्फ प्रधानमंत्री तक ही सीमित क्यों है? संथाली, मुंडारी, हो, कुड़ुख- क्या ये भाषाएं इस देश की भाषाएं नहीं हैं? या फिर ये भाषाएं तब तक भाषा नहीं मानी जाएंगी, जब तक दिल्ली के स्टूडियो में इनसे TRP नहीं बनेगी?
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आज विडंबना देखिए – देश की राष्ट्रपति संथाली भाषा में गीत गा रही हैं और मीडिया के लिए यह कोई खबर नहीं है. लेकिन यही उनके भगवान- यानी मोदी जी अगर “जोहार” भी बोल दें, तो मीडिया दो पंक्तियों के भाषण को राष्ट्रवाद का उत्सव बना देती है. आज सवाल किसी व्यक्ति का नहीं है, आज सवाल नैरेटिव का है… गिरी हुई मानसिकता ग्रस्त मिडिया का. आज अगर एक आदिवासी राष्ट्रपति की आदिवासी भाषा देश की मीडिया के लिए खबर नहीं है तो फिर इस देश की आदिवासी पहचान सिर्फ संविधान की किताबों तक सीमित रह गई है.
शायद इसीलिए झारखंड की खबरें झारखंड तक ही सीमित रह जाती हैं, और दिल्ली तय करती है कि क्या राष्ट्रीय है? और दोस्तों ये खबर शिकायत नहीं है. बस एक आईना है जिसमें देश की मीडिया खुद को देखे और खुद से पूछे क्या हमें सिर्फ सत्ता की भाषा सुननी है या इस देश की भी. क्योंकि अगर इस देश की मीडिया का बस चले. तो खबर नहीं चलाएगी…भजन भी करेगी…हवन भी करेगी…आरती भी उतारेगी और ये करते हुए हर बार बोलेगी की आज इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री ने जो कहा वही राष्ट्र का अंतिम सत्य है.
