RANCHI : पुलिस अक्सर यह अभियान चलाती है कि “गुड समेरीटन” को सम्मानित किया जाय ताकि इससे प्रेरणा लेकर अन्य लोग भी आपदा के समय परोपकार या मदद की भावना मन में रख कर पीड़ित लोगों की मदद को आगे आएं. “गुड समेरीटन” को आमतौर पर सड़क दुर्घटना के संदर्भ में देखा जाता है लेकिन इसके आशय पर गौर करें तो एक परोपकारी स्वभाव का व्यक्ति जो संकट में पड़े व्यक्ति के प्रति दयालु और मदद करने वाला होता है.
बिल्कुल ऐसी ही मदद को आगे आया था अंश-अंशिका के गायब होने वाले मोहल्ले में स्थित दुकान का पूरा परिवार. लेकिन बदले में उस परिवार को क्या मिला? बेकसूर होने बाद भी 12 दिन की मानसिक यातना और जीवन भर का असहनीय दर्द. अंश-अंशिका के गायब होने के बाद आखिरी बार उन्हें उसी दुकान पर देखा गया था, दुकानदार ने भी आगे बढ़कर, मदद की नीयत से कहा था, हां ! दोनों बच्चे आए तो थे यहां. बस फिर क्या था, पूरा परिवार आ गया पुलिसिया कार्रवाई की जद में.

दुकानदार कांति देवी के अनुसार बेटे को पुलिस थाने ले जा कर बेइंतहा मारा गया, बहु को महिला थाना में बैठा दिया गया जैसे ये अपराधी हों. पूरे घर के अंदर स्निफर डॉग दौड़ाए गए. पुलिस कभी भी दरवाजा पीट देती थी. पूरे 12 दिन मानसिक प्रताड़ना से गुजरें हैं हम लोग. बाहर निकलना तक मुश्किल था. कांति देवी कहती हैं कि हमारे साथ जो हुआ वो किसी के साथ नहीं होना चाहिए. सच का साथ देने की कीमत हमने बड़ी भारी चुकाई है.
ऐसे में बड़ा सवाल ये है कि अब क्या कोई आगे आ कर “गुड समेरीटन” बनने की कोशिश करेगा? क्या पूछताछ के तरीके मानवीय नहीं हो सकते? दुकानदार का पूरा परिवार जिस मानसिक कष्ट और यातना से गुजरा है उसकी भरपाई कौन करेगा?
इसे भी पढ़ें : सचः पुलिस की अथक प्रयास हो रही थी फेल, लेकिन सचिन और डब्लू की हिम्मत और सोशल मीडिया की ताकत से मिले अंश-अंशिका
