Ritika
RANCHI : झारखंड के धनबाद से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे राज्य में बहस छेड़ दी है. खबर एक वायरल वीडियो की है, जिसमें दिख रही महिला पुलिस अधिकारी, अलिशा कुमारी, भोजपुरी गाने “टूट जाइ राजाजी पलंग सांगवान के” पर मंच के पास महिलाओं के साथ नाचती नजर आती हैं. यह वीडियो राजगंज में चैती दुर्गा पूजा के दौरान आयोजित डांडिया नाइट कार्यक्रम का बताया जा रहा है. सुरक्षा व्यवस्था के लिए वहां मौजूद राजगंज थाना प्रभारी से उत्साहित महिलाओं ने डांस करने का आग्रह किया और उन्होंने मुस्कुराते हुए कुछ पल उनके साथ कदम-ताल मिला दिया. बस फिर क्या था, कुछ सेकंड का यह वीडियो सोशल मीडिया पर ऐसा वायरल हुआ कि देखते ही देखते करोड़ों लोगों तक पहुंच गया और देखते ही देखते पुलिस महकमे में भी हड़कंप मच गया.
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विभागीय कार्रवाई में पक्षपात क्यों
मामला जब अधिकारियों तक पहुंचा तो धनबाद एसएसपी प्रभात कुमार ने सख्त रुख अपनाते हुए थाना प्रभारी अलीशा कुमारी को लाइन हाजिर कर दिया और जांच के आदेश दे दिए. अब सवाल यहीं से शुरू होता है और यहीं से यह मामला सिर्फ एक वीडियो नहीं बल्कि पूरे सिस्टम और समाज की सोच पर सवाल बनकर खड़ा हो जाता है. क्या वर्दी पहनने के बाद कोई इंसान, इंसान नहीं रहता. क्या पुलिसकर्मी अपनी भावनाएं व्यक्त नहीं कर सकता, हंस-बोल नहीं सकता, खुश नहीं हो सकता, त्योहार में दो कदम नाच नहीं सकता. अगर यही अपराध है तो फिर वह तमाम वीडियो क्यों नजरअंदाज कर दिए जाते हैं जिनमें पुलिसकर्मी इंस्टाग्राम, फेसबुक और यूट्यूब पर रील बनाते नजर आते हैं, कभी फिल्मों के गानों पर एक्टिंग करते हैं, कभी अपनी वर्दी में रौब और दबंगई दिखाते हैं. तब विभागीय अनुशासन याद क्यों नहीं आता. तब लाइन हाजिर क्यों नहीं किया जाता. और जब किसी पुलिसकर्मी की गुंडागर्दी, दबंगई या सत्ता का दुरुपयोग सामने आता है तब कार्रवाई इतनी तेज क्यों नहीं होती.
गीत आपत्तिजनक, बजाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं
यहां असली सवाल यह है कि क्या कार्रवाई सिर्फ इसलिए हुई क्योंकि वीडियो वायरल हो गया या इसलिए कि यह एक महिला अधिकारी थीं. क्योंकि अगर गाना आपत्तिजनक था तो यह गाना पूजा पंडालों में क्यों बजता है, त्योहारों में क्यों बजता है, सार्वजनिक मंचों पर क्यों बजता है. उस समय किसी को इसकी आपत्ति क्यों नहीं होती. और अगर गाना गलत है तो उसे बजाने वालों पर कार्रवाई क्यों नहीं होती. सच यह है कि वर्दी अनुशासन का प्रतीक जरूर है, लेकिन वर्दी पहनने वाला भी इंसान ही होता है, उसके भी जज्बात होते हैं, उसकी भी खुशियां होती हैं.
ईमानदारी पर प्रश्नचिन्ह क्यों
त्योहार के माहौल में महिलाओं के आग्रह पर कुछ सेकंड मुस्कुराकर डांस कर देना क्या इतना बड़ा अपराध हो गया कि उसे सजा दे दी जाए. क्या इससे उनकी ईमानदारी पर सवाल उठ जाता है, क्या इससे उनकी ड्यूटी कमजोर हो जाती है. दूसरी तरफ यह तर्क भी दिया जा रहा है कि वर्दी में रहने वाला अधिकारी जनता के सामने विभाग की छवि का प्रतिनिधित्व करता है इसलिए उसे हर कदम सोच समझकर उठाना चाहिए. लेकिन फिर सवाल वही है कि क्या अनुशासन सिर्फ चुनिंदा मामलों में ही लागू होगा. अगर नियम है तो सबके लिए समान होना चाहिए.
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पुलिसकर्मी भी इंसान
आज यह मामला झारखंड में एक बड़ी बहस बन चुका है. एक तरफ लोग कह रहे हैं कि विभागीय अनुशासन जरूरी है और वर्दी में ऐसी चीजें नहीं होनी चाहिए, वहीं दूसरी तरफ बड़ी संख्या में लोग कह रहे हैं कि पुलिसकर्मी भी इंसान हैं और उन्हें भी खुश होने का हक है. सच क्या है, फैसला क्या सही है और क्या गलत, यह तो आगे की बात है लेकिन इतना जरूर तय है कि इस घटना ने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—क्या वर्दी पहनते ही इंसान की खुशियां खत्म हो जाती हैं या फिर हमारा समाज अभी भी वर्दी के पीछे छिपे इंसान को देखना ही नहीं चाहता.
