RANCHI : बाप रे बाप! क्या आपने बीजेपी झारखंड का ताजा आंदोलन देखा? नहीं देखा? चिंता मत कीजिए, क्योंकि अब आंदोलन देखने के लिए सड़क पर निकलने की जरूरत नहीं होती. आईए, हम दिखाते हैं – यह रहा मीम, यह रही वीडियो, यह रही फोटो, और ऊपर से सोने पर सुहागा – डायलॉग पंच.
मंच सजा है, कैमरा ऑन है और बीजेपी का आंदोलन तैयार है. आप भी यही कहेंगे – यह वही धरती है, जहां कभी बाबा बिरसा मुंडा के तीर चलते थे, अब यहां रील चलती है. रीलों की बारिश भी कोई मामूली नहीं – खांटी सावन वाली. बेतला, सारंडा और पलामू के मोर तक कंफ्यूज हैं कि किस बारिश में नाचा जाए – बरसात वाली में या बीजेपी वाली में?
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जब आंदोलन सड़क पर हुआ करते थे
वो दिन भी थे जब आंदोलन सड़क पर उतरते थे, रैलियां निकलती थीं, सत्ता से खुलकर सवाल होते थे, और प्रदर्शनकारियों की छाती पर वाटर कैनन के निशान हुआ करते थे. अब यह सब इतिहास बन चुका है. आज आंदोलन की जिम्मेदारी जमीन से हटाकर सीधे IT सेल को सौंप दी गई है. सोशल मीडिया के रणबांकुरों ने मोर्चा संभाल लिया है. नेता PVR में हैं, और जो गिने-चुने लोग जमीन पर निकल भी रहे हैं, उनके हाथ में बस भगवान जगन्नाथ का सहारा है.
‘पार्टी ऑफ मूवमेंट’ से ‘पार्टी ऑफ पोस्ट’
कभी कहा जाता था – यह पार्टी नहीं, Party of Plans, Party of Action, Party of Movement है. आज सब कुछ सिमटकर हरमू स्थित बीजेपी के हरमू कार्यालय तक सीमित हो गया है. शायद यही वजह है कि DIG ग्राउंड का आंदोलन, जो जमीन पर होना था, वो फेसबुक के आसमान में उड़ता दिख रहा है – AI वीडियो और एडिटेड क्लिप्स के सहारे.
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बची-खुची कसर बाबूलाल मरांडी ने पूरी कर दी. चाहे अवैध खनन हो, घोटाले हों या कानून-व्यवस्था का सवाल – हर मुद्दा उठता है, लेकिन प्रेस कॉन्फ्रेंस तक ही सिमट कर रह जाता है.
पहचान का संकट?
राजनीतिक जानकारों का कहना है कि अगर यही सिलसिला चलता रहा, तो आज जो ताकत सिर्फ सत्ता और राज्यसभा भेजने तक सीमित है, कल वही ताकत पहचान के संकट (Identity Crisis) से जूझती नजर आएगी.
आंदोलन का नया फॉर्मूला
कुल मिलाकर, बीजेपी झारखंड के आंदोलन का फॉर्मूला अब बिल्कुल साफ है – जमीन पर कम, जूम पर ज्यादा सड़क पर नारे की जगह, स्टोरी पर कैप्शन. और जहां कभी आंदोलन से सत्ता कांपती थी, आज वहां एल्गोरिदम, एंगेजमेंट, लाइक और शेयर की राजनीति है. झारखंड में अब आंदोलन नहीं होते – अब रणबांकुरों ने Upload, Download और Copy–Paste सीख लिया है.
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(यह लेख लेखक के निजी विचार हैं.)
