Vaibhav
DEOGHAR : देवघर सदर प्रखंड में एक प्रशासनिक निर्णय अब गंभीर सवालों के घेरे में है. आरोप है कि जहां सरकार के स्पष्ट निर्देशों के अनुसार रिक्त प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी (BPRO) का प्रभार संबंधित प्रखंड के सबसे वरिष्ठ पंचायत सचिव को दिया जाना चाहिए था, वहां यह जिम्मेदारी एक VLW (Village Level Worker) को सौंप दी गई . यह मामला केवल पदस्थापन का नहीं, बल्कि विभागीय आदेशों की अवहेलना और प्रशासनिक प्रक्रिया की पारदर्शिता से जुड़ा हुआ है.
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क्या कहते हैं सरकारी आदेश
झारखंड सरकार, पंचायती राज विभाग द्वारा समय-समय पर जारी आदेश इस विषय में स्पष्ट दिशा-निर्देश देते हैं. सबसे पहले तो यह जान लीजिए कि कौन से पत्र में क्या लिखा हुआ है और वो पत्र कब-कब जारी किए गए.
- पत्र संख्या 2199
तारीख 12 नवम्बर 2021
इस पत्र में कहा गया कि जहां प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी का पद रिक्त हो, वहां प्रशासनिक कार्यों के सुचारु संचालन के लिए योग्य और वरीय पंचायत सचिव को अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है.
- पत्रांक 29
तारीख 04 जनवरी 2024
इस आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि एक पंचायत सचिव को अधिकतम दो ग्राम पंचायतों का ही प्रभार दिया जा सकता है, और अतिरिक्त जिम्मेदारियों का निर्धारण वरिष्ठता के आधार पर होगा.
- पत्रांक 2578
तारीख 15 अक्टूबर 2024
यह पत्र और भी शीशे की तरह साफ है. इसमें निर्देशित किया गया कि प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी के खाली पद पर प्रभार केवल उसी जिले में पदस्थापित वरीय पंचायत सचिव को दिया जाए, जो निर्धारित शैक्षणिक योग्यता और अनुभव रखता हो.
- पत्रांक 2995
तारीख 19 दिसंबर .2024
इस पत्र के माध्यम से सभी जिलों को उपर्युक्त आदेशों के अनुपालन की पुनः याद दिलाई गई. इन सभी आदेशों में कहीं भी VLW को BPRO का प्रभार देने का उल्लेख नहीं है.
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देवघर सदर में क्या हुआ
पुख्ता सूत्रों के अनुसार देवघर सदर प्रखंड में BPRO का पद वर्तमान में खाली है. ऐसे में नियम के अनुसार उस प्रखंड में काम करने वाले सबसे वरिष्ठ पंचायत सचिव को प्रभार दिया जाना चाहिए था. लेकिन आरोप है कि इसके विपरीत एक VLW को प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी का प्रभार सौंप दिया गया. यहीं से विवाद शुरू होता है.
VLW और पंचायत सचिव, क्या दोनों बराबर हैं
प्रशासनिक ढांचे में पंचायत सचिव और VLW दो अलग-अलग पद हैं. पंचायत सचिव पंचायत प्रशासन, वित्तीय कामों, पंचायत बैठकों, अभिलेख प्रबंधन और सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन से सीधे जुड़े होते हैं. वहीं VLW का दायित्व मुख्यतः ग्राम स्तरीय योजनाओं के समन्वय और फील्ड कार्यों तक सीमित होता है. प्रखंड पंचायती राज पदाधिकारी का पद इन दोनों से उच्च प्रशासनिक स्तर का होता है, जिसमें वित्तीय स्वीकृति, निरीक्षण, निगरानी और पंचायतों के कार्यों का समन्वय शामिल है. अब ऐसे में सवाल उठता है की क्या VLW उस पद के लिए अधिकृत है? क्या उसके लिए कोई अधिसूचना या संशोधित नियम जारी हुआ है? अगर नहीं, तो यह निर्णय किस आधार पर और किसकी ओर से लिया गया?
वरिष्ठता की अनदेखी
देवघर सदर प्रखंड में पदस्थापित वरिष्ठ पंचायत सचिवों का कहना है कि विभागीय नियमों के बावजूद उन्हें दरकिनार किया गया. अगर वास्तव में वरिष्ठता सूची की अनदेखी कर किसी अन्य कैडर के कर्मचारी को प्रभार दिया गया है, तो यह सेवा नियमों का उल्लंघन माना जा सकता है. प्रशासनिक व्यवस्था में वरिष्ठता केवल औपचारिकता नहीं होती, यह अनुभव, जवाबदेही और संस्थागत स्थिरता का प्रतीक होती है.
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संभावित प्रशासनिक प्रभाव क्या हो सकते हैं
इस निर्णय के कई प्रशासनिक प्रभाव हो सकते हैं जैसे वित्तीय प्रक्रियाओं पर असर. BPRO स्तर पर लिए जाने वाले निर्णयों में वित्तीय जवाबदेही महत्वपूर्ण होती है. इसके बाद डिजिटल सिग्नेचर और पोर्टल संचालन भी कई योजनाओं में अधिकृत अधिकारी के डिजिटल प्रमाणीकरण की आवश्यकता होती है. तीसरा यानी जवाबदेही के प्रश्न की यदि आदेश नियमों के विपरीत हुआ है, तो जिम्मेदारी किसकी होगी? और अंतिम की अन्य प्रखंडों के लिए उदाहरण–यदि यह निर्णय वैध माना जाता है, तो क्या भविष्य में अन्य स्थानों पर भी ऐसा होगा?
क्या यह केवल प्रशासनिक विवेक है
कुछ अधिकारी इसे “प्रशासनिक आवश्यकता” बता सकते हैं. लेकिन सवाल यह है कि जब स्पष्ट लिखित आदेश मौजूद है, तो प्रशासनिक विवेक की सीमा कहां तक है? अगर नियम में संशोधन हुआ है, तो वह सार्वजनिक क्यों नहीं किया गया? अगर कोई विशेष परिस्थिति थी, तो उसका उल्लेख आदेश में क्यों नहीं है?
कौन है जवाबदेह
यह मामला कई स्तरों पर जवाब मांगता है. क्या देवघर जिला प्रशासन ने पंचायती राज विभाग से अनुमति ली? क्या वरिष्ठता सूची के आधार पर कोई प्रस्ताव भेजा गया था? क्या विभाग ने लिखित स्वीकृति दी या यह निर्णय स्थानीय स्तर पर लिया गया? क्यूंकि जब तक इन प्रश्नों का आधिकारिक उत्तर नहीं मिलता, संदेह बना रहेगा. Loktantra 19 की टीम ने देवघर डीसी नमन प्रियेश लकड़ा को 2 बार कॉल कर मामले के बारे में उनका पक्ष जानने की कोशिश भी की लेकिन उनसे बात नहीं हो पायी.
पंचायती राज व्यवस्था लोकतंत्र की नींव है. ग्राम स्तर से लेकर प्रखंड स्तर तक की पारदर्शिता ही प्रशासन की विश्वसनीयता तय करती है. अगर नियमों का पालन नहीं होगा, तो सबसे पहले प्रभावित होंगे
ग्राम पंचायत, जनप्रतिनिधि और अंततः आम नागरिक देवघर सदर प्रखंड का यह मामला अब एक गंभीर प्रशासनिक बहस का विषय बन चुका है.
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