Vaibhav
RANCHI : तमिलनाडु के एक 22 साल के लॉ स्टूडेंट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि ‘सुप्रीम कोर्ट भगवान नहीं है.’ इस 22 साल के लॉ स्टूडेंट के इन शब्दों ने पूरे देश में एक तूफान खड़ा कर दिया है. क्या एक आम नागरिक देश की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ऑफ इंडिया पर सवाल उठा सकता है. या फिर ऐसा करना सीधे-सीधे अपराध है. एक तरफ है संविधान का अधिकार Article19. 1(a) जो आपको बोलने की आज़ादी देता है. और दूसरी तरफ है न्यायालय की अवमानना, जो आपकी इसी आज़ादी को सीमित कर सकता है. तो आखिर सच क्या है. क्या वो छात्र सही है, या फिर कानून सही है.
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रिपोर्ट्स और सोशल मीडिया दावों के अनुसार, तमिलनाडु नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के अंतिम वर्ष के छात्र ऋषि कुमार ने एक पोस्ट लिखी. उस पोस्ट का शीर्षक था,“The Supreme Court of India Has No Spine” इस पोस्ट में उसने सुप्रीम कोर्ट के कुछ फैसलों और सिस्टम की पारदर्शिता पर सवाल उठाए.
उसने ये भी कहा कि अदालत भगवान नहीं है और उसे उत्तरदायित्व और जवाबदेही से ऊपर नहीं रखा जा सकता. बस यहीं से शुरू हुआ विवाद. बताया जा रहा है कि, जब पोस्ट वायरल हुई तब यूनिवर्सिटी प्रशासन ने दबाव डाला, और ऋषि कुमार को पोस्ट हटाने को कहा गया, लेकिन छात्र ने साफ मना कर दिया कि मैं एक शब्द भी डिलीट नहीं करूंगा.
अब बात करते हैं उस टेक्स्टबुक की जिसे लेकर इतना विवाद बताया जा रहा है. एनसीईआरटी की किताबों में पिछले कुछ सालों में कई बदलाव किए गए हैं, रिपोर्ट्स के अनुसार कुछ चैप्टर में, दंगे, राजनीतिक इतिहास और संस्थागत आलोचना को हटाया या संशोधित किया गया. सोशल मीडिया पर ये दावा किया गया है कि एक कक्षा आठवीं की किताब में न्यायालय संबंधी और संस्थानों से जुड़ी कुछ विवादित बातें थीं. मतलब चैप्टर, न्यायालय और भ्रस्टाचार से जुडा हुआ था, जिसे बाद में हटा दिया गया, लेकिन यहां ध्यान देने वाली बात ये है कि किताबों में परिवर्तन या संशोधन आमतौर पर एनसीईआरटी और शिक्षा मंत्रालय के स्तर पर होते हैं. सुप्रीम कोर्ट सीधे जाकर किताबें प्रतिबंधित नहीं करता, और इसी बात को आधार बना कर ये ‘रीढ़विहीन’ और ‘अदालत भगवान नहीं है’ जैसे लाइन और शब्द सोशल मीडिया में आने लगे.
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अब सवाल उठता है अगर कोई सुप्रीम कोर्ट की आलोचना करता है , तो कोर्ट क्या कर सकता है.
तो यहां पर आता है “Contempt of Courts Act, 1971”, इसके तहत अदालत के पास शक्ति है कि वह किसी भी व्यक्ति के खिलाफ एक्शन ले सकता है, अगर वो अदालत के अधिकार को कमजोर करे या न्यायतंत्र की छवि को नुकसान पहुंचाए. और कानूनी भाषा में इसे ही कहा गया है ‘आपराधिक अवमानना’. सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि “निष्पक्ष आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन न्यायालय को बदनाम करना स्वीकार नहीं”. मतलब,आसान भाषा में आप फैसले की आलोचना कर सकते हैं लेकिन न्यायाधीश या संस्थान अर्थात कोर्ट को अपमानित नहीं कर सकते.
अब आता है असली टकराव, एक तरफ है Article 19. 1(a) जो आपको बोलने की आज़ादी देता है और दूसरी तरफ है Article 19. 2 जो कहता है कि इस आज़ादी पर उचित प्रतिबंध लग सकते हैं. इन प्रतिबंधों में शामिल है- न्यायालय की अवमानना (Contempt of Court, Defamation) और सार्वजनिक व्यवस्था (Public order) यानी आप बोल सकते हैं लेकिन हर चीज नहीं बोल सकते. और यही वह अस्पष्ट विषय है जहां ये पूरा विवाद खड़ा होता है.
अब सबसे आखिरी सवाल और मुद्दा और वो ये कि क्या अदालत की आलोचना करना गलत है? तो जवाब सीधा है कि नहीं. भारत में आप, अदालत के फैसलों की आलोचना कर सकते हैं, कानूनी तर्क पर सवाल उठा सकते हैं. न्यायिक सुधार की मांग कर सकते हैं, लेकिन अगर आप कहते हैं कि न्यायाधीश भ्रष्ट हैं या कोर्ट बिक चुकी है या बिना सबूत के आरोप लगाते हैं तो यह न्यायालय की अवमानना का मामला बन सकता है.
तो इस पूरी कहानी में सच क्या है. एक तरफ है एक स्टूडेंट जो कहता है कि, अदालत भगवान नहीं है तो दूसरी तरफ है देश की सबसे बड़ी अदालत जो कहती है की आजादी के साथ जिम्मेदारी भी आती है,
और बीच में खड़ा है भारत का संविधान. सवाल अब भी वही है कि क्या हम सच में पूरी तरह से स्वतंत्र हैं बोलने के लिए. या हमारी आज़ादी की भी एक सीमा है.
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