RANCHI : एक तरफ पूरी दुनिया ‘वर्ल्ड थिएटर डे’ मना रही है, वहीं झारखंड की राजधानी रांची में इस बार मंच ही खाली नजर आया. जिस शहर में 13 सालों से लगातार हो रहा छोटानागपुर नाट्य महोत्सव कला की पहचान बन चुका था, वहां इस बार सन्नाटा पसरा है. इसकी सबसे बड़ी वजह विभाग द्वारा मांगा गया भारी-भरकम किराया बताया जा रहा है.
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कला जगत से जुड़े लोगों का आरोप है कि यह सिर्फ किराया बढ़ाने का मामला नहीं, बल्कि एक ऐसी सोच का परिणाम है जो धीरे-धीरे झारखंड की सांस्कृतिक जड़ों को कमजोर कर रही है. कई कलाकारों ने बिना नाम लिए मंत्री सुदिव्य सोनू की कार्यशैली पर सवाल खड़े किए हैं.
“मुफ्त वाला कल्चर खत्म” बयान बना विवाद की जड़
मंत्री सुदिव्य सोनू का यह बयान कि ‘मेंटेनेंस के लिए पैसे चाहिए, मुफ्त में मंच नहीं मिलेगा’ अब कलाकारों के बीच तीखी प्रतिक्रिया का कारण बन गया है. कलाकारों का कहना है कि सरकार अगर मंच को ‘कमाई का जरिया’ बना देगी, तो उभरते कलाकार कहां जाएंगे? स्थानीय रंगकर्मियों का कहना है कि पहले जहां सरकार मंच उपलब्ध कराकर कला को बढ़ावा देती थी, अब वही मंच किराए की वजह से कलाकारों की पहुंच से बाहर हो गया है. एक वरिष्ठ रंगकर्मी ने कहा, ‘अगर यही हाल रहा तो आने वाले समय में झारखंड में न थिएटर बचेगा, न कलाकार. यह सीधा-सीधा सांस्कृतिक खत्म होने की शुरुआत है.
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13 साल की परंपरा टूटी
हटिया नाट्य महोत्सव, जो पिछले 13 वर्षों से लगातार हो रहा था, इस बार नहीं हो सका. आयोजकों का कहना है कि भारी किराया और प्रशासनिक उदासीनता इसकी बड़ी वजह है. यह महोत्सव सिर्फ एक कार्यक्रम नहीं, बल्कि झारखंड के लोक और आधुनिक कला के संगम का प्रतीक था.
क्या ‘सनक’ से खत्म होगी कला?
कला जगत में अब यह चर्चा तेज है कि क्या कुछ फैसले व्यक्तिगत सोच और ‘जिद’ के आधार पर लिए जा रहे हैं? कई लोग इसे सुदिव्य सोनू की ‘कठोर और असंवेदनशील नीति’ बता रहे हैं, जो कलाकारों के लिए घातक साबित हो सकती है. वहीं सरकार का तर्क है कि संसाधनों के रखरखाव के लिए शुल्क जरूरी है और इससे व्यवस्था बेहतर होगी. लेकिन सवाल यह है कि क्या यह ‘व्यवस्था’ कला की कीमत पर बनाई जा रही है?
