DHANBAD : बुधवार 4 फरवरी को धनबाद के ऐतिहासिक गोल्फ ग्राउंड में झारखंड मुक्ति मोर्चा का 54वां स्थापना दिवस मनाया गया. यह इस मायने में ऐतिहासिक रहा कि इससे पहले के आयोजनों में झामुमो के अध्यक्ष के रूप में दिशोम गुरु शिबू सोरेन की उपस्थिति अनिवार्य रूप से रहती थी, लेकिन इस बार से ये कार्यक्रम अब उनकी उनकी अनुपस्थिति में आयोजित होते रहेंगे. 4 अगस्त 2025 को उनका निधन हो गया. इस कार्यक्रम की शुरुआत उनको श्रद्धांजलि देते हुए की गई.
इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन भी शामिल हुए. नगर निकाय चुनाव के कारण लगे आचार संहिता को मद्देनजर रखते हुए सीमित समय के इस कार्यक्रम में उन्होंने गुरु जी को श्रद्धांजलि देते हुए कार्यक्रम में शामिल सभी को बधाई दी एवं आभार जताया.
कार्यक्रम को लेकर मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने सोशल मीडिया में कई महत्वपूर्ण बातें कहीं, प्रस्तुत है कुछ अंशः

75 फीसदी में झारखंडियों का अधिकार
उन्होंने कोयला उत्पादन के मामले में धनबाद के विशिष्ट महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि पब्लिक सेक्टर में लगी हुईं आउटसोर्सिंग कंपनियां यहां के स्थानीय मजदूरों को रखना नहीं चाहती हैं, उन्हें लगता है कि यहां के स्थानीय मजदूर आंदोलन करते रहेंगे. लेकिन ये याद रखना होगा कि यहां के 75 फीसदी स्थानीय लोगों को रखना ही होगा. वरना यहां के लोग अपना हक-अधिकार लेना भी जानते हैं.
राज्य के साथ सौतेला व्यवहार
मुख्यमंत्री ने कहा कि केंद्र हमारे साथ सौतेला व्यवहार करता है, इस राज्य को जानबूझकर गरीब और कमजोर किया गया है. यहां के संसाधनों से दूसरे राज्य में विकास करना है. यह राज्य 25 साल का हो गया है, यदि शुरू से ही इस राज्य की ठीक ढंग से देखभाल की गई होती तो यह राज्य आज कई राज्यों से आगे होता. लेकिन हमने भी प्राण लिया है, जैसे लड़ कर झारखंड लिया है उसी तरह से लड़ कर अपना अधिकार भी लेंगे चाहे वो लड़ाई राजनीतिक हो या फिर कानूनी.

धनबाद की धरती से क्रांति
हेमंत सोरेन ने धनबाद की धरती को क्रांतिकारियों की धरती बताया, कहा कि यहां अनेक वीरों ने जन्म लिया है. गरीब, शोषित, किसान और मजदूरों को दमनकारी लोगों से लड़ने के लिए नेतृत्व दिया. जिन्होंने सुरक्षा कवच की भांति इन पीड़ित लोगों की रक्षा की. हमारा पूरा झारखंड ही वीर भूमि है, जहां भगवान बिरसा मुंडा, सिद्धो-कान्हू, तिलका मांझी, बिनोद बिहारी महतो से लेकर आदरणीय गुरुजी तक का संघर्ष, बलिदान और समर्पण आज हमें अलग पहचान देता है.
इस ऐतिहासिक स्थल से हमारे मार्गदर्शक रहे कई नेताओं ने कई लंबी लकीर खींची है. आदिवासी मूलवासी के अधिकार, यहां के जल,जंगल, जमीन से लेकर इस राज्य के अलग होने घोषणा इसी मैदान से हुई.
