DHANBAD : धनबाद की सियासत में ‘सिंह मेंशन’ का दबदबा एक बार फिर कायम हो गया है. बगावत, विरोध और समर्थन की जंग के बीच आखिरकार संजीव सिंह धनबाद के नए मेयर बन गए. झरिया के पूर्व विधायक संजीव सिंह लगभग आठ साल तक अपने चचेरे भाई की हत्या के आरोप में जेल में बंद रहे. अदालत से बाइज्जत बरी होने के बाद उन्होंने सक्रिय राजनीति में जोरदार वापसी की.इसी बीच झारखंड में नगर निकाय चुनाव की घोषणा हुई. चुनाव भले ही गैर-दलगत आधार पर होना था, लेकिन लगभग सभी राजनीतिक दलों ने अपने-अपने समर्थित प्रत्याशियों को मैदान में उतारने का फैसला किया. संजीव सिंह ने झारखंड भाजपा को पत्र लिखकर नगर निगम चुनाव लड़ने की इच्छा जताई और समर्थन मांगा. लेकिन भाजपा ने उन्हें समर्थन देने के बजाय संजीव कुमार को अपना प्रत्याशी घोषित कर दिया. इसके बाद सियासी पारा चढ़ गया. संजीव सिंह ने खुली बगावत का ऐलान किया और खुद को मेयर पद का प्रत्याशी घोषित कर मैदान में उतर गए. विरोध के बीच यह दांव सीधा पड़ा और अब धनबाद की मेयर कुर्सी पर ‘सिंह मेंशन’ की फिर से वापसी हो चुकी है.
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आठ साल जेल में रहने के बाद उन्होंने निर्दलीय उम्मीदवार के रूप में मेयर पद जीता और भाजपा समर्थित उम्मीदवार संजीव कुमार को कड़ी टक्कर देकर हराया. मतगणना दूसरे दिन रात 12 बजे तक चली और नौवें व अंतिम राउंड में नतीजा पूरी तरह साफ हो गया. संजीव सिंह को कुल 1,04,731 वोट मिले, जबकि उनके निकटतम प्रतिद्वंद्वी जेएमएम समर्थित चंद्रशेखर अग्रवाल को 76,207 वोट मिले. यानी उन्होंने 31,902 वोटों के बड़े अंतर से जीत दर्ज की. कांग्रेस समर्थित शमशेर आलम अंसारी को 55,272 वोट मिले और भाजपा समर्थित संजीव कुमार को 54,827 वोट मिले, जिससे वे चौथे स्थान पर रहे. लंबे समय से भाजपा का गढ़ माने जाने वाले धनबाद में इस तरह का परिणाम राजनीतिक हलकों में बड़ी चर्चा का विषय बन गया है.
अब बात करते हैं कि संजीव सिंह की जीत की वजह क्या रही और भाजपा क्यों हारी. पहली बड़ी वजह रही उनका पारिवारिक प्रभाव. वे झरिया के पूर्व विधायक सूरजदेव सिंह के पुत्र हैं, जिनका नाम आज भी धनबाद की राजनीति में असर रखता है.“सिंह मेंशन” का राजनीतिक प्रभाव अब भी जमीन पर दिखाई देता है. दूसरी वजह रही उनका व्यक्तिगत नेटवर्क और समर्थकों की मजबूत टीम, जिसने बूथ स्तर तक काम किया. तीसरी वजह विपक्षी वोटों का बंटवारा भी रहा, जिससे उन्हें सीधा फायदा मिला. वहीं भाजपा की हार के पीछे कई कारण दिखते हैं. सबसे अहम कारण रहा पार्टी के अंदर असंतोष और बागी उम्मीदवार का मैदान में उतरना. खुद भाजपा के पूर्व विधायक रहे संजीव सिंह के बागी बनकर चुनाव लड़ने से भाजपा के पारंपरिक वोटों में सीधा विभाजन हुआ.कुल मिलाकर यह चुनाव परिणाम भाजपा के लिए आत्ममंथन का संकेत है, जबकि संजीव सिंह के लिए यह राजनीतिक पुनरुत्थान की बड़ी जीत मानी जा रही है.
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